रविवार, 26 अगस्त 2012

अर्चना


आओ आओ बेग पधारो व्याकुल ह्रदय हमारा है ,
नाथ न क्यों सुनते अनुनय हो निठुर भाव क्यों धारा है !

दुखी दीन हैं, मन मलीन हैं तेरी गउएँ गोपाला,
आजा फिर दिखला दे मोहन मधुर दृश्य गोकुल वाला !

बृज की शोभा क्षीण हुई है ऐ बृजराज दुलारे आ ,
विरह व्यथा से व्याकुल गोपिन के जीवन उजियारे आ !

माँ जसुदा की सुघर गोद के प्यारे कुँवर कन्हैया आ ,
वंशीधारी, गिरिवरधारी, वन-वन वेणु बजैया आ !

किरण