शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

पानी गिरा कर मेह के रूप में







 पानी गिरा कर मेह के रूप में
अन्न उगाते कभी अभिराम हैं !

शोभा दिखाते हमें अपनी जो ऐसी
फिर विद्युत रूप कभी वे ललाम हैं !









शब्द सुना कर घन गर्जन का
ध्वनि शंख की करते कभी बलभान हैं !

घनश्याम के रूप में आज सखी
इस हिंद में आये वही घन श्याम हैं !








किरण

18 टिप्‍पणियां:

  1. टेम्पलेट बहुत अच्छा लगा |कविता भी सचित्र अच्छी सदा की तरह |
    आशा

    जवाब देंहटाएं
  2. साधना जी ...कम शब्दों मे सघन प्रभु की याद ...बहुत सुंदर प्रस्तुति ....!!
    आभार.

    जवाब देंहटाएं
  3. अभी ब्लॉग ४वार्ता में यह लिंक देखी |
    आशा

    जवाब देंहटाएं
  4. पहले तो आपको जन्मदिन की हार्दिक बधाई ..... :)
    माँ को नमन चरण-वंदना .... :)
    बहुत सुन्दर कविता रूपी प्रभु-वन्दना .... !!

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही अच्छी कविता..रस बरसा गयी..

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    जवाब देंहटाएं
  7. घनश्याम के रूप में आज सखी
    इस हिंद में आये वही घनश्याम हैं ....

    घनश्याम के रूप में आए घन श्याम हैं ... वाह ... लाजवाब क्रश्न्मायी रचना ...

    जवाब देंहटाएं