शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

पानी गिरा कर मेह के रूप में







 पानी गिरा कर मेह के रूप में
अन्न उगाते कभी अभिराम हैं !

शोभा दिखाते हमें अपनी जो ऐसी
फिर विद्युत रूप कभी वे ललाम हैं !









शब्द सुना कर घन गर्जन का
ध्वनि शंख की करते कभी बलभान हैं !

घनश्याम के रूप में आज सखी
इस हिंद में आये वही घन श्याम हैं !








किरण