सोमवार, 28 मई 2012

अश्रुमाल















नाथ तुम्हारी क्षुद्र सेविका लाई यह रत्नों का हार ,
तुम पर वही चढ़ाती हूँ मैं करना मेरे प्रिय स्वीकार !

मेरा मुझ पर नाथ रहा क्या जो कुछ है वह तेरा है ,
मुझे निराशा अरु आशा की लहरों ने प्रभु घेरा है !

तुम लक्ष्मी माँ के प्रिय पति हो रत्न भेंट हों कैसे नाथ ,
रत्नों की जब खान स्वयं माँ होवें प्रियतम तेरे साथ !

बस हैं यह आँसू ही भगवन्  जिनका है यह हार सजा ,
करती  भेंट करो स्वीकृत प्रभु यद्यपि तुम्हें यह रहा लजा !

किरण