शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

अभिसार


चलो चलें उस ओर प्रेम की
मधुर ज्योति जहाँ जगे सखी ,
प्रेम वायु के शीतल झोंके
इधर-उधर से लगें सखी !

प्रेम सिंधु के उर प्रांगण में
चलो तरंगें बनें सखी ,
मिल कर प्रियतम के संग हम तुम
प्रेम केलि में पगें सखी !

आओ बना प्रेम का मंदिर
प्रिय की मूर्ति बिठायें सखी ,
जग के हर कोने-कोने में
प्रेम सुधा सरसायें सखी !

गा-गा करके राग प्रेम के
प्रियतम को हरषायें सखी ,
तन मन धन सब आज गँवा कर
प्रिय प्रसाद को पायें सखी !


किरण

चित्र गूगल से साभार