मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

दीपावली - एक विरल दृष्टि




माँ की सतत संवेदनशील दृष्टि ने उस समय की विसंगतियों को कितनी खूबसूरती के साथ इस रचना में उतारा है आप स्वयं देखें ! आश्चर्य होता है ये रचनाएं आज भी कितनी सामयिक एवं प्रासंगिक लगती हैं !

दीपावली
आज भूतल पर गगन का साज साजा जा रहा है ,
देख लो !
धवल मरकत का गगनचुम्बी महल जो दीखता है ,
लग रहा लघु श्वेत बालक एक उड़ना सीखता है ,
और बिजली का लगा उस पर बड़ा लट्टू सुनहरा ,
पूर्णिमा के पूर्ण शशि को भी लजाने जा रहा है ,
देख लो !
उस तरफ मीनार पर है हरी बिजली जल रही जो ,
शुक्र की शुभ शांत आभा सी सभी को छल रही जो ,
अस्त उसका शुक्र के ही अस्त सा देगा सदा फल ,
कोटियों का भाग्य तारा अस्त होने जा रहा है ,
देख लो !

और देखो उस तरफ है दीन उजड़ी झोंपड़ीं कुछ ,
टिमटिमाते दीप कुछ के द्वार पर, सूनी पड़ीं कुछ ,
ज्योति के इस पुंज में मद्धिम प्रभा जो निज छिपाये ,
जल रहे ज्यों गगन के ये हिरण भू पर आ रहे हैं ,
देख लो !


उस तरफ है दीपकों की क्षीण लौ बुझती हुई सी ,
इस तरफ विद्युत् छटा है आँख में चुँधती हुई सी ,
नभ सरित सी कान्ति भू पर आज छाते तेल दीपक ,
अरुन्धती उड़ सप्तॠषि संग टिमटिमाता जा रहा है ,
देख लो !
छुट रही जो फुलझड़ी लगती सलोनी मन लुभानी ,
ज्यों बिखरते तारकों की ज्योति लगती है सुहानी ,
और वह आकाश तारा उड़ चला भू पर बिखरने ,
धूमकेतू सा धरा की ओर बढ़ता आ रहा है ,
देख लो !
यह दिवाली की निशा है कर रही कुछ का दिवाला ,
कुछ उमंग में फिर रहे हैं छीन औरों का निवाला ,
आज जन में और धन में होड़ कुछ ऐसी लगी है ,
द्रव्य ज्योतित सूर्य शशि सा, अस्त मानव हो रहा है ,
देख लो !
आज भूतल पर गगन का साज साजा जा रहा है ,
देख लो !


किरण