गुरुवार, 28 जुलाई 2011

जगमग जग हो जाये

कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

नील गगन के दीप सुनहरे
लाकर धरती पर बिखराओ ,
सप्त सिंधु की लोल लहरियों
पर जागृति का साज सजाओ ,

कवि तुम ऐसा राग सुनाओ
छोड़ उदासी सब मुस्कायें !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

बाल सूर्य की सुघर रश्मियाँ
लाकर कण-कण ज्योतित कर दो ,
अरुण उषा का पिला सोमरस
रागान्वित सबका मन कर दो ,

कवि तुम ऐसी बीन बजाओ
तन मन धन की सुधि खो जाये !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

शीतल स्वाति बूँद चुन-चुन कर
शान्ति सुधा रस ला बरसाओ ,
तप्त धरणी, संतप्त प्राण उर
में शीतलता आ फैलाओ ,

कवि तुम ऐसी प्रीति जगाओ
राग द्वेष सब क्षय हो जाये !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !


किरण