शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

कलिका के प्रति

री इठलाती क्यों बार-बार !
मदमस्त हुई चंचल कलिके,
क्यों झूल रही तू डार-डार !

री इठलाती क्यों बार-बार !

टुक दे तो ध्यान अरी पगली
क्या जीवन का है अर्थ अरे,
क्यों व्यर्थ गर्व में दीवानी
तू निज तन में सौंदर्य भरे,
ओ मतवाली ले नयन खोल
बस है जीवन में हार-हार !

री इठलाती क्यों बार-बार !

है अभी बालपन भोला सा
पर सजनि रहेगा सदा नहीं,
आयेगा मतवाला यौवन
जो ले जायेगा तुझे कहीं,
आयेंगे प्रेमी मधुप सखी
दो एक नहीं हाँ चार-चार !

री इठलाती क्यों बार-बार !

वे भरे स्वार्थ से मतवाले
तव सुषमा लूट चुकेंगे जब,
उड़ जायेंगे फिर दूर दिशा
तेरी मनुहार करेंगे कब,
हो जायेगा मधुरे तेरा
यह सुन्दर यौवन भार-भार !

री इठलाती क्यों बार-बार !

आवेगा बन प्रचण्ड झंझा
बहता रहता जो मलयानिल,
शीतलता देती चन्द्रकिरण
तब बन जायेगी अरी अनल,
गिर जायेगी फिर धरिणी पर
हाँ हो करके तू छार-छार !

री इठलाती क्यों बार-बार !

कर मर-मर शब्द कथा अपनी
फिर कहा करेंगे अंग तेरे ,
उड़ करके आँधी के संग हा
मिट जायेंगे अरमान भरे ,
कहने सुनने को कथा तेरी
रह जायेगी बस सार-सार !

री इठलाती क्यों बार-बार !


किरण