मंगलवार, 25 जनवरी 2011

अमर रहे यह गणतंत्र

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर माँ की लिखी यह कविता आप सबके लिये उपलब्ध करा रही हूँ ! आशा है आपको पसंद आयेगी !

क्यों उषा की लालिमा मुसका रही है,
क्यों निशा की कालिमा सकुचा रही है,
कर रहीं शहनाइयाँ क्यों मधुर सा रव,
क्यों मृदुल स्वर से प्रभाती गा रही है !

क्यों वसंती पवन यह बौरा रहा है,
क्यों कली पर झूम यह भौंरा रहा है,
क्यों गगन में मन रही दीवालियाँ हैं,
सूर्य क्यों अद्भुत प्रभा फैला रहा है !

कोकिला किनकी गुणावलि गा रही है,
कीर्ति किनकी गगन को गुन्जा रही है,
सप्त सागर जलांजलि देते किन्हें हैं,
जाह्नवी की क्यों लहर गरुवा रही है !

यह विजय उत्सव मनाया जा रहा है,
हर्ष का सौरभ लुटाया जा रहा है,
आज है गणतंत्र दिन इस हिंद का,
अमर वीरों को बुलाया जा रहा है !

यह विजय हमको बड़ी मँहगी पड़ी है,
भेंट अगणित प्राण की देनी पड़ी है,
फल गयी हैं आज सब कुर्बानियाँ वे,
यातना झेली, व्यथा सहनी पड़ी है !

उन शहीदों की चिता पर बढ़ चलो जन,
दीप श्रद्धा के जला कर ले चलो जन,
भेंट कर दो भावना के पुष्प मंजुल,
अभय हो गणतंत्र यह वर माँग लो जन !

जय भारत ! जय गणतंत्र ! वंदे मातरम !

किरण