रविवार, 2 जनवरी 2011

प्राण तुम्हारे नयनों में

प्राण तुम्हारे नयनों में मैं
खोज रही कुछ सुख का स्त्रोत,
दीन निर्धनों की आहों से
करुणामय हो ओत-प्रोत !

आज हृदय में शक्ति न इतनी
नयनों का अभिसार करूँ,
प्रणय सिंधु के तीर खड़ी मैं
कैसे तुमको प्यार करूँ !

मुझे बुलाती अट्टहास कर
उन लहरों की तीव्र पुकार,
स्वयम् बिखर जाती टकरा कर
चट्टानों से हो जो छार !

आज सहोदर भ्राताओं में
है कितना वैषम्य महान्,
एक झुक रहा है चरणों में
और दूसरा लिये कृपाण !

सुख की सेज, राजसी भोजन
वस्त्रों से पूरित भण्डार,
एक सुखी है और दूसरा
नंगे भूखों का सरदार !

भूखे नन्हे बच्चों की वे
करुण पुकारें उठ कर आज,
अंतरिक्ष से जा टकरातीं
और लौटतीं बेआवाज़ !

दुःख के भीषण अंधकार में
सुख की किरण न पहुँची एक,
नयनों का निर्झर झर करता
दरिद्र देव का है अभिषेक !

हृदय कष्ट से रो-रो उठता
पर कैसे प्रतिकार करूँ ,
दुखियारे मानव समाज पर
दया करूँ या प्यार करूँ !

किरण