हा सूखी उर की डाली !
आज गया है रूठ अनोखा इस उपवन का माली !
हा सूखी उर की डाली !
स्वाँस पवन की शीतलता से मिटा न उसका ताप,
आशा की किरणें आकर के बढ़ा गयीं संताप,
नयन सरोवर लुटकर भी हा कर न सके हरियाली !
हा सूखी उर की डाली !
भाव कुसुम अधखिली कली भी हाय न होने पाये,
असमय में ही विरह ज्वाल में दग्ध हुए मुरझाये,
शब्द पल्लवों से आच्छादित काव्य-कुञ्ज हैं खाली !
हा सूखी उर की डाली !
किरण
शुक्रवार, 28 मई 2010
बुधवार, 26 मई 2010
* तारे *
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
चम-चम करते रहते प्रतिपल,
झर-झर झरते रहते हर क्षण,
पी-पी कर ह्रदय रक्त पागल
ये लाल बने रहते सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
वह दीवानी ना जान सकी,
पागल सुख के क्षण पा न सकी,
सूने उर में भर अंधकार
जग को चिर सुख देती सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
दुखिया जीवन में हाय न कुछ,
रोना, रोकर खोना सब कुछ,
सीखा रजनी से मैंने भी
यह धैर्य अटल अद्भुत सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
उसके उर क्षत मेरे वे पथ,
औ प्रिय नयनों के बने सुरथ,
मेरे ये उत्सुक नयन वहाँ
उनको लख सुख पाते सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
किरण
चम-चम करते रहते प्रतिपल,
झर-झर झरते रहते हर क्षण,
पी-पी कर ह्रदय रक्त पागल
ये लाल बने रहते सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
वह दीवानी ना जान सकी,
पागल सुख के क्षण पा न सकी,
सूने उर में भर अंधकार
जग को चिर सुख देती सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
दुखिया जीवन में हाय न कुछ,
रोना, रोकर खोना सब कुछ,
सीखा रजनी से मैंने भी
यह धैर्य अटल अद्भुत सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
उसके उर क्षत मेरे वे पथ,
औ प्रिय नयनों के बने सुरथ,
मेरे ये उत्सुक नयन वहाँ
उनको लख सुख पाते सजनी !
ये रजनी के उर क्षत सजनी !
किरण
रविवार, 23 मई 2010
साथी मेरे गीत खो गए !
साथी मेरे गीत खो गए !
उस दिन चन्दा अलसाया था,
मेरे अंगना में आया था,
किरणों के तारों पर उसने
धीमे-धीमे कुछ गाया था !
जग के नयनों में स्वप्नों के,
साज सजे, विश्वास सो गए !
साथी मेरे गीत खो गए !
रजनी थी सुख से मुस्काई,
मधु ऋतु में फूली अमराई,
शांत कोटरों में सोई कोकिल
ने फिर से ली अंगड़ाई !
पीत पत्र बिखरे पेड़ों के,
अस्त-व्यस्त श्रृंगार हो गए !
साथी मेरे गीत खो गए !
किरण
उस दिन चन्दा अलसाया था,
मेरे अंगना में आया था,
किरणों के तारों पर उसने
धीमे-धीमे कुछ गाया था !
जग के नयनों में स्वप्नों के,
साज सजे, विश्वास सो गए !
साथी मेरे गीत खो गए !
रजनी थी सुख से मुस्काई,
मधु ऋतु में फूली अमराई,
शांत कोटरों में सोई कोकिल
ने फिर से ली अंगड़ाई !
पीत पत्र बिखरे पेड़ों के,
अस्त-व्यस्त श्रृंगार हो गए !
साथी मेरे गीत खो गए !
किरण
शुक्रवार, 21 मई 2010
स्वप्न आते रहे
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
चंद्रिका ने दिया आँसुओं को लुटा,
उनको ऊषा ने निज माँग में भर लिया,
पुष्प झरते रहे, वृक्ष लुटते रहे,
भ्रमर आते रहे, गुनगुनाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही, स्वप्न आते रहे !
छोड़ हिम को सरित बह चली चंचला,
सिंधु की शांत सुषमा ने उसको छला,
वीचि हँसती रही, खिलखिलाती रही,
तट उन्हें बाँह फैला बुलाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
कुहुक कर कोकिला के कहा “कौन है ?’
“पी कहाँ”, कह पपीहा हुआ मौन है,
मेघ उत्तर न देकर बिलखते रहे,
मोर उन्मत्त खुशियाँ मनाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
सृष्टि का क्रम सदा से विषम ही रहा,
सुख औ दुख का जो समन्वय रहा,
कुछ तड़पते रहे, कुछ बिलखते रहे,
कुछ मिटा और को सुख सजाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात रोती रही स्वप्न आते रहे !
किरण
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
चंद्रिका ने दिया आँसुओं को लुटा,
उनको ऊषा ने निज माँग में भर लिया,
पुष्प झरते रहे, वृक्ष लुटते रहे,
भ्रमर आते रहे, गुनगुनाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही, स्वप्न आते रहे !
छोड़ हिम को सरित बह चली चंचला,
सिंधु की शांत सुषमा ने उसको छला,
वीचि हँसती रही, खिलखिलाती रही,
तट उन्हें बाँह फैला बुलाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
कुहुक कर कोकिला के कहा “कौन है ?’
“पी कहाँ”, कह पपीहा हुआ मौन है,
मेघ उत्तर न देकर बिलखते रहे,
मोर उन्मत्त खुशियाँ मनाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात जगती रही स्वप्न आते रहे !
सृष्टि का क्रम सदा से विषम ही रहा,
सुख औ दुख का जो समन्वय रहा,
कुछ तड़पते रहे, कुछ बिलखते रहे,
कुछ मिटा और को सुख सजाते रहे !
चाँद तारे दीवाली मनाते रहे,
रात रोती रही स्वप्न आते रहे !
किरण
बुधवार, 19 मई 2010
सखी न कुछ भी भाता आज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
गुंजित मधुर कूक कोयल की,
मादक अलियों का सरसाज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
आज न भाता मदिर भाव से
प्रमुदित ऊषा का आना,
आज न भाता मृदु मलयानिल
का सुमनों को छू जाना,
अरी न भाती चंद्र ज्योत्सना
और न रजनी का प्रिय साज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
आज न जाने कैसा मन है,
कैसा है संसृति का राग,
मेरी उर वीणा से प्रतिपल,
झंकृत क्यों है करूण विहाग,
हुआ न जाने क्या री मुझको
भूली हूँ सारे ही काज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
चलित चित्र से मधुर गत दिवस
क्यों आते स्मृति में आज,
उत्सुक हो उन्मत्त नयन क्यों
सजा रहे हैं नव सुख साज,
अश्रु लुटाते पल क्षण जीवन,
छाया असफलता का राज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
किरण
गुंजित मधुर कूक कोयल की,
मादक अलियों का सरसाज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
आज न भाता मदिर भाव से
प्रमुदित ऊषा का आना,
आज न भाता मृदु मलयानिल
का सुमनों को छू जाना,
अरी न भाती चंद्र ज्योत्सना
और न रजनी का प्रिय साज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
आज न जाने कैसा मन है,
कैसा है संसृति का राग,
मेरी उर वीणा से प्रतिपल,
झंकृत क्यों है करूण विहाग,
हुआ न जाने क्या री मुझको
भूली हूँ सारे ही काज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
चलित चित्र से मधुर गत दिवस
क्यों आते स्मृति में आज,
उत्सुक हो उन्मत्त नयन क्यों
सजा रहे हैं नव सुख साज,
अश्रु लुटाते पल क्षण जीवन,
छाया असफलता का राज !
सखी न कुछ भी भाता आज !
किरण
रविवार, 16 मई 2010
हताशा
तुम न आये मैं तुम्हारी बाट ही तकती रही,
और स्वागत को तुम्हारे साज नव सजती रही !
तुम न आये सूर्य की अंतिम किरण भी खो गयी है,
तुम न आये चन्द्र की यह ज्योत्सना भी सो गयी है !
तुम न आये पर निशा ने कालिमा जग पर बिछा दी,
तुम न आये फिर उषा ने अरुणिमा भू पर लुटा दी !
तुम न आये कामना की कली भी मुरझा चली है,
तुम न आये साधना की श्रंखला सकुचा चली है !
तुम न आये लगन की डोरी ह्रदय की टूटती है,
तुम न आये सब्र की पतवार कर से छूटती है !
तुम न आये नाव जीवन की अतल में जा रही है,
तुम न आये ज्योति आशा की तिमिर से छा रही है !
तुम अगर आते मनुज की भावना सूनी न रहती,
तुम अगर आते धरा की विकलता दूनी न रहती !
किन्तु मानव की पुकारें लौट आईं तुम न आये,
और धरती की कराहें लौट आईं तुम न आये !
द्वार पर जा मंदिरों के लौट आई तुम न आये,
तुम रहे पाषाण ही क्यों देवता तुम बन न पाए !
किरण
और स्वागत को तुम्हारे साज नव सजती रही !
तुम न आये सूर्य की अंतिम किरण भी खो गयी है,
तुम न आये चन्द्र की यह ज्योत्सना भी सो गयी है !
तुम न आये पर निशा ने कालिमा जग पर बिछा दी,
तुम न आये फिर उषा ने अरुणिमा भू पर लुटा दी !
तुम न आये कामना की कली भी मुरझा चली है,
तुम न आये साधना की श्रंखला सकुचा चली है !
तुम न आये लगन की डोरी ह्रदय की टूटती है,
तुम न आये सब्र की पतवार कर से छूटती है !
तुम न आये नाव जीवन की अतल में जा रही है,
तुम न आये ज्योति आशा की तिमिर से छा रही है !
तुम अगर आते मनुज की भावना सूनी न रहती,
तुम अगर आते धरा की विकलता दूनी न रहती !
किन्तु मानव की पुकारें लौट आईं तुम न आये,
और धरती की कराहें लौट आईं तुम न आये !
द्वार पर जा मंदिरों के लौट आई तुम न आये,
तुम रहे पाषाण ही क्यों देवता तुम बन न पाए !
किरण
शुक्रवार, 14 मई 2010
कारवाँ संहार का
रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
कंठ में भर स्वर प्रभाती का मधुर
अलस कलिका संग कीलित नव उषा,
खिलखिलाती आ गयी जब अवनितल
देख उसका लास यह बोली निशा,
ह्रास मेरा दे रहा जीवन तुझे,
क्रम यही है निर्दयी संसार का !
रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
छोड़ हिमगिरी अंक को उन्मत्त सी
उमड़ कर सरिता त्वरित गति बह चली,
माँगते ही रह गए तट स्नेह जल,
बालुका का दान रूखा दे चली,
जब मिटा अस्तित्व सागर अंक में
कह उठी, ‘है अंत पागल प्यार का’ !
रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
जन्म पर ही मृत्यु ने जतला दिया
सृजन पर है नाश का पहला चरण,
क्षितिज में अस्तित्व मिटता धरिणी का,
खिलखिलाता व्योम कर उसका हरण,
अश्रु जल ढोता सदा ही भार है,
प्रेम का और हर्ष के अभिसार का !
रो रही है सर पटक कर ज़न्दगी,
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
किरण
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
कंठ में भर स्वर प्रभाती का मधुर
अलस कलिका संग कीलित नव उषा,
खिलखिलाती आ गयी जब अवनितल
देख उसका लास यह बोली निशा,
ह्रास मेरा दे रहा जीवन तुझे,
क्रम यही है निर्दयी संसार का !
रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
छोड़ हिमगिरी अंक को उन्मत्त सी
उमड़ कर सरिता त्वरित गति बह चली,
माँगते ही रह गए तट स्नेह जल,
बालुका का दान रूखा दे चली,
जब मिटा अस्तित्व सागर अंक में
कह उठी, ‘है अंत पागल प्यार का’ !
रो रही है सर पटक कर ज़िंदगी
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
जन्म पर ही मृत्यु ने जतला दिया
सृजन पर है नाश का पहला चरण,
क्षितिज में अस्तित्व मिटता धरिणी का,
खिलखिलाता व्योम कर उसका हरण,
अश्रु जल ढोता सदा ही भार है,
प्रेम का और हर्ष के अभिसार का !
रो रही है सर पटक कर ज़न्दगी,
और बढता जा रहा है कारवाँ संहार का !
किरण
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