सोमवार, 23 अप्रैल 2012

न खुशियों में हो मस्त तुम













कुछ बहारों ने आकर चमन से कहा ,
यूँ न फूलो न खुशियों में हो मस्त तुम!

हमने माना खिले गुल हर इक शाख पर
हर कली झूमती , मस्त है ज़िंदगी ,
बुलबुलें गा रहीं गीत मस्ती भरे
कर रहीं तितलियाँ झुक तुम्हें बंदगी !

चार दिन को मिली ताज़गी जो तुम्हें
कुछ करो, दूसरों की भलाई करो ,
छोड़ दो तुम गरूर और झूठी हया
गर मरो तो शहीदों की मानिंद मरो !

मुस्कुराता  समाँ रह न पायेगा फिर
फिर न बुलबुल तराने सुना पायेगा ,
जब उजड़ जायेगा वह नशेमन, न फिर
वह खुशी के तराने सुना पायेगा !

इसलिये याद रक्खो अरे गुलिस्ताँ
दूसरों के लिये मत रहो मस्त तुम ,
कुछ बहारों ने आकर चमन से कहा
यूँ न फूलो न खुशियों में हो मस्त तुम !


किरण