शनिवार, 14 जनवरी 2012

वसन्त का भोर


आज अपनी माँ की काव्य मंजूषा से एक बहुत ही खूबसूरत रचना आपके लिये लेकर लाई हूँ ! इस रचना में देश के तत्कालीन कर्णधारों के प्रति उनका यह भोला विश्वास आम जनता की आशाओं का प्रतिनिधित्व करता है ! यह विश्वास कितना कायम रह सका और कितना टूटा यह तो सभी जानते हैं लेकिन इस रचना की सकारात्मकता अपने आप में अद्भुत है !
द्वार पर है वसन्त का भोर
जा रहा है पतझड़ मुख मोड़ ,
प्रगति के चरण बढ़ रहे हैं
अभावों की चिंता दो छोड़ !

रिक्त सब पात्र भरेंगे शीघ्र
रमा का फिर होगा साम्राज्य ,
दुखों की चादर होगी क्षीण
बढ़ेगा सुख सौरभ अविभाज्य !

काल की चाल बदल देगा
हमारा नया स्वर्ण इतिहास ,
लक्ष्य सारे ही होंगे पूर्ण
हृदय में है इतना उल्लास !

प्रमोदिनी ऊषा आयेगी
नित्य मंगल घट लेकर प्रात ,
खिलेंगे मुरझाये तब फूल
हँसेंगे कोमल तन जल जात !

साधना का फल शुभ होगा
मिलेगा जीवन को वरदान ,
हमारी मातृभूमि है स्वर्ग
न हो फिर क्यों इस पर अभिमान !

दक्ष भारत के कर्णाधार
शान्ति के दूत, दया के देव ,
त्याग की मूर्ति लिये स्फूर्ति
बताते पथ हमको स्वयमेव !

मिलेगी क्यों न हमें फिर विजय
न होगा क्यों चिंता से त्राण ,
अभावों का निश्चय है नाश
प्रफुल्लित होंगे तन-मन-प्राण !

श्रमिक नव चेतन पायेंगे
दलित त्यागेंगे भ्रम भय भूत ,
एकता होगी फिर अक्षय
विरोधों की छँट करके छूत !

ज्ञान का कोष लुटा देगा
विश्व का तब यह देश महान ,
सूर्य की प्रथम किरण के साथ
गगन में गूँजे गौरव गान !


किरण