गुरुवार, 5 जनवरी 2012

फूल बनूँ या धूल बनूँ

यह इच्छा है बहुत युगों से
फूल बनूँ या धूल बनूँ ,
तेरे किसी काम आऊँ मैं
अपना जीवन धन्य करूँ !

फूल बनूँ तो देवालय के
किसी वृक्ष से जा चिपटूँ ,
तेरे किसी भक्त द्वारा प्रिय
तेरे चरणों से लिपटूँ !

फूल नहीं तो धूल बनाना
जिस पर भक्त चलें तेरे ,
उनके पावन युगल चरण से
अंग पुनीत बनें मेरे !

किन्तु भाग्य के आगे किसका
वश चलता मेरे भगवन् ,
विधि विडम्बना से यदि मैं बन सकूँ
न पग की भी रज कण !

तो प्रभुवर पूरी करना यह
मेरे मन में बसी उमंग ,
करुणा करके मुझे बनाना
प्रेम सिंधु की तरल तरंग !


किरण