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रविवार, 4 मार्च 2012

जीवन प्याली


मेरी जीवन प्याली दे
तू बूँद-बूँद भर साकी ,
परिपूरित कर दे कण-कण
रह जाये न खाली बाकी !

मैं ढूँढ-ढूँढ थक आई
साकी तेरी मधुशाला ,
दे दे भर-भर कर मुझको
मोहक प्याले पर प्याला !

मैं हो जाऊँ पी-पी कर
बेसुध पागल मतवाली ,
छा जावे इन अधरों पर
तेरे मधु की मृदु लाली !

ले अमिट साध यह साकी
मैं तेरे सम्मुख आई ,
इस हाला में जीवन की
सारी सुख शान्ति समाई !

दे साकी इतनी हाला
बेसुध होऊँ छक जाऊँ ,
बस एक बार ही पीकर
साकी अनंत तक जाऊँ !


किरण

चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

साध

लेकर के उर में एक साध !

मैं आई तेरे द्वार आज
पूरण कर मेरी अमिट चाह ,
सुस्मित अधरों से एक बार
दे बहा मधुर ध्वनि का प्रवाह ,

भर जाये प्रेम सागर अगाध !
कर पूरण मेरी अमर साध !

ऐसा मृदु मंजुल राग बजा ,
अविराम अचल अविरल अनंत ,
नीरस जग जीवन में फिर से
छा जाये कुसुमित नव वसन्त ,

मिट जावे जग से चिर विवाद !
कर पूरण मेरी अमर साध !

वन-वन उपवन गृह नगर-डगर
सौरभमय जिससे दिग्दिगंत ,
वितरित कर अपनी मलय पवन
सुरभित श्वांसों से रे अनंत ,

रे नहीं तुझे कुछ भी असाध !
कर पूरण मेरी अमर साध !

जग नयनों की जलधारा से
कर लेता तेरे पग पखार ,
जग की आहें बन कर पराग
पहुँचें तुझ तक कर क्षितिज पार ,

निर्विघ्न चली जायें अबाध !
कर पूरण मेरी अमर साध !

हो जाये तरल तेरी करुणा
दुखियों पर बरबस पड़े बरस ,
लहलहा उठें सूखे जीवन
हो जायें मधुर, हो उठें सरस ,

निर्जीव बने नैराश्य व्याध !
कर पूरण मेरी अमर साध !

आनंद प्रेम से मतवाली
फिर चहक उठे दुनिया भोली ,
करुणामय करुणा कर इतनी
भर दे मेरी रीती झोली ,

मैं आई लेकर एक साध !
कर पूरण मेरी अमर साध !


किरण

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

आशा

देव ! तुम्हारा ध्यान हृदय में कई बार आता ,
नयी इक ज्योति जगा जाता ,
मान का कमल खिला जाता ,
योजना नयी बना जाता ,
दे जाता है अहा हृदय को वह सांत्वना महान ,
भूल जाती हूँ दुःख अपमान !

निराशा होती जीवन में ,
दुःख हो जाता है मन में ,
रोग लग जाते हैं तन में ,
तेल घटता है क्षण-क्षण में ,
तभी शीघ्र आ जाता प्रियतम अहा तुम्हारा ध्यान ,
फूल उठता है हृदयोद्यान !


किरण

रविवार, 13 नवंबर 2011

मंगल कामना


ओ शरद निशे ले आई हो
क्यों अद्भुत सुख भण्डार सखी ,
लहराता दसों दिशाओं में
आनंद का पारावार सखी !

ले मूक हुई वाणी, कैसे
अब करूँ प्रकट उद्गार सखी ,
सह सकता कैसे दीन हृदय
कब इतने सुख का भार सखी !

बिखरा कर मधुर चंद्रिका यह
किसका तू है स्वागत करती ,
देती बिखेर स्वर्णिम तारे
मानों निर्धन का घर भरती !

मुक्तामय ओस गिरा कर जो
बहुमूल्य निछावर तू करती ,
किसका इस मदिर पवन द्वारा
आराधन, आवाहन करती !

कुछ ऊली फूली बढ़ी चली
किस ओर अरी जाती सजनी ,
द्रुम दल को हिला-हिला सजनी
कल कीर्ति मधुर गाती सजनी !

यदि लाल किले के सुदृढ़ मार्ग
की ओर चली जाती सजनी ,
तो हृदय कुञ्ज के भाव कुसुम
पहुँचा उन तक आती सजनी !

देती बिखेर उन चरणों पर
इस तुच्छ हृदय का प्यार सखी ,
लेती पखार फिर युगल चरण
निर्मल नयनांजलि ढार सखी !

पुलकित उर वीणा की उन तक
पहुँचाना यह झंकार सखी ,
तेरे स्वर में मिलकर ये स्वर
कर उठें मधुर गुंजार सखी !

पृथ्वी, जल, वायु रहे जब तक
गंगा जमुना की धार सखी ,
शशि रहे चंद्रिकायुक्त, रवि
रहे ज्योति का आगार सखी !

लहराए तिरंगा भारत का
सत् रज तम हो साकार सखी ,
हो सुदृढ़ राष्ट्र की नींव
अखंडित हो स्वतंत्र सरकार सखी !


किरण