रविवार, 21 अगस्त 2011

कन्हैया












गोकुल के रचैया अरु गोकुल के बसैया हरी ,
माखन के लुटैया पर माखन के रखैया तुम !

गोधन के कन्हैया अरु गोवर्धन उठैया नाथ ,
बृज के बसैया श्याम बृज के बचैया तुम !

भारत रचैया अरु भारत बचैया कृष्ण ,
गीता के सुनैया अरु गीता के रचैया तुम !

बंसी के बजैया अरु चीर के चुरैया हरि ,
नागन के ऊपर चढ़ि नृत्य के करैया तुम !

सारी के चुरैया अरु सारी के बढ़ैया साथ ,
भरी सभा द्रौपदी की लाज के रखैया तुम !

राधा के गहैया श्याम राधा के छुड़ैया योगी ,
गोपिन संग कुंजन में रास के रचैया तुम !

पापी अरु पापिन को स्वर्ग के दिलैया नाथ ,
शरण हूँ मैं लाज राखो कुँवर कन्हैया तुम !


किरण








शनिवार, 20 अगस्त 2011

अभिलाषा

देशप्रेम की अद्भुत भीनी-भीनी बयार आजकल भारत की फिजाओं में बह रही है ! आज अपनी मम्मी की देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत एक बहुत ही सुन्दर रचना प्रस्तुत कर रही हूँ ! आशा है आप सबको अवश्य पसंद आयेगी !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो दीप बनूँ उस कुटिया का जो दुःख की झंझा से उजड़ी ,
निज प्राणों का नित स्नेह जला करता रहता उजियारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो बनूँ कृषक ऊसर जग में बो दूँ अरमानों के मोती ,
मेटूँ नैराश्य फसल जिससे जीवन को तनिक सहारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो बनूँ हिमालय का पत्थर कल-कल करती निर्झरिणी का ,
चरणों से टकरा बिखर पडूँ तट की रज का अंगारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो पुष्प बनूँ उस उपवन का जो गया उजड़ हो पतझड़ में ,
कोकिल ने पल भर को ही फिर निज स्वर से जिसे गुंजारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो नीर बनूँ उस मरुथल का जिसमें प्यासा खोया-खोया ,
मृगजल से जाकर छला खोजता रेती में जलधारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो बनूँ आह दुर्बल उर की जग से ठुकराया जाकर जो ,
अपने जीवन का भार लिये गिनता रजनी का तारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो बनूँ द्वार उस मंदिर का, खंडहर बन निर्जन में एकल
हो पड़ा हुआ, जिसमें भूले पंथी ने समय गुज़ारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

तो आस बनूँ दुखिया मन की जो सदा अभावों से लड़ कर ,
थक हार विवश आकुल-व्याकुल पीता अश्रु जल धारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !

पतवार बनूँ उस नौका की जो बीच भँवर में जा उलझी ,
खो चुकी दिशायें लहरों में नज़रों से दूर किनारा हो !

जो मेरा जन्म दोबारा हो !


किरण




गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अभिनन्दन













स्वंत्रता दिवस पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनायें ! आज अपनी माँ की मंजूषा से उनकी कविता के रूप में यह अनमोल रत्न निकाल कर आप सबके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ जो कदाचित उन्होंने भारत की स्वतन्त्रता की पहली वर्षगाँठ पर लिखी होगी ! लीजिए आप भी इसका आनंद उठाइये !

अभिनन्दन

ओ स्वतंत्र भारत तेरे गौरव का फिर शुभ दिन आया ,
बाल अरुण निज स्वर्ण पात्र में कुमकुम भर कर ले आया !

तारागण बिखेर जीवन निधि मना रहे दीवाली सी ,
कुहुक उठी पूजन बेला में यह कोकिल मतवाली सी !

विजय हार पहनाने को ऋतुपति कुसुमायुध ले आया ,
श्रम सीकर चुन-चुन मलयानिल आर्द्र भाव से सकुचाया !

शुभ्र किरीट पहन है हिमगिरि आज गर्व से उन्नत और ,
हर्ष वेग से उछला पड़ता छू सागर चरणों की कोर !

तेरे वीर सुपुत्रों के मस्तक तेरे मणिहार बने ,
झिलमिल करते दिग्दिगंत जो उज्ज्वल रत्नागार बने !

आज वारने को तुझ पर रत्नों को ले अगणित आये ,
दर्शन कर तेरी सुषमा का जीवन धन्य बना पाये !

प्यारे भारत हृदय कुञ्ज के कुसुमों की गूँथी माला ,
आज तुझे पहनाने को लेकर आई है यह बाला !

स्वीकृत कर कृतकृत्य बना इस मन का भी रख लेना मान ,
मैं भी सफल पुजारिन हूँ यह जान मुझे होगा अभिमान !


किरण

चित्र गूगल से साभार !






मंगलवार, 2 अगस्त 2011

आँधी आई


सारे जग में आँधी आई !
पृथ्वी के कण-कण से उठ कर
जड़ चेतन तक सबमें छाई !
जग जीवन में आँधी आई !

तरु से विलग हुए नव पल्लव
पुष्प गुच्छ सुन्दर सुकुमार ,
नन्हें-नन्हें फल डालों से
गिरे अधपके हो जग भार !
दीन झोंपड़ी से दावानल
की लपटें उठ-उठ छाईं !

जग जीवन में आँधी आई !

युवकों में छाया जोश नया
अरु जग में फ़ैली क्रान्ति बयार ,
गिरते हुए देश में फिर से
नयी शक्ति का था संचार !
आँधी बन कर क्रान्ति
नया संदेशा भारत में लाई !

जग जीवन में आँधी आई !

सूक्ष्म रूप से हृदय कुटी में
पहुँची ले उन्माद नया ,
भोलापन उसके संग में पड़
अपने हाथों गया छला !
आग लगा जीवन वन में
धर नया रूप आँधी आई !

सारे जग में आँधी आई ,
जग जीवन में आँधी छाई !


किरण

भारत में


गुरुवार, 28 जुलाई 2011

जगमग जग हो जाये

कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

नील गगन के दीप सुनहरे
लाकर धरती पर बिखराओ ,
सप्त सिंधु की लोल लहरियों
पर जागृति का साज सजाओ ,

कवि तुम ऐसा राग सुनाओ
छोड़ उदासी सब मुस्कायें !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

बाल सूर्य की सुघर रश्मियाँ
लाकर कण-कण ज्योतित कर दो ,
अरुण उषा का पिला सोमरस
रागान्वित सबका मन कर दो ,

कवि तुम ऐसी बीन बजाओ
तन मन धन की सुधि खो जाये !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !

शीतल स्वाति बूँद चुन-चुन कर
शान्ति सुधा रस ला बरसाओ ,
तप्त धरणी, संतप्त प्राण उर
में शीतलता आ फैलाओ ,

कवि तुम ऐसी प्रीति जगाओ
राग द्वेष सब क्षय हो जाये !
कवि तुम ऐसी ज्योति जलाओ
जगमग जगमग जग हो जाये !


किरण

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

कृतघ्न मानव

निठुर मनुज की दानवता को कब किसने पहचाना !

प्रथम स्नेह का सम्बल देकर दीपक को भरमाया ,
सरल वर्तिका के जीवन को तिल-तिल कर जलवाया ,
जिसने ज्योति बिखेरी सब पर उसके तले अँधेरा ,
पर उपकारी इस दीपक ने जग से है क्या पाया !

इसने चुप-चुप जलना सीखा, जग ने इसे जलाना !
निठुर मनुज की दानवता को कब किसने पहचाना !

जिस माटी से अन्न उगा, जिसमें जीवन के कण हैं ,
मिलता अमृत सा जल जिसके अंतर से प्रतिक्षण है ,
किन्तु इसे ही व्यर्थ समझ कर सबने की अवहेला ,
जग के अत्याचारों के उस पर कितने ही व्रण हैं !

इसने पल-पल गलना सीखा, जग ने इसे गलाना !
निठुर मनुज की दानवता को कब किसने पहचाना !

निर्धन कृषकों की मेहनत का फल है सबने देखा ,
उसके अगणित उपकारों का कहो कहाँ पर लेखा ,
रूखी-सूखी खाकर वे औरों पर अन्न लुटाते ,
अंग-अंग से बहा पसीना, मुख स्मित की रेखा !

फिर भी इसने डरना सीखा, जग ने इसे डराना !
निठुर मनुज की दानवता को कब किसने पहचाना !

जिस नारी के रक्तदान से नर ने यह तन पाया ,
जिसने गीले में सोकर सूखे में इसे सुलाया ,
आज उसी को पशु बतला कर करते हाय अनादर ,
जिसने बरसों भूखी रह कर मन भर इसे खिलाया !

इसने केवल रोना जाना, जग ने इसे रुलाना !
निठुर मनुज की दानवता को कब किसने पहचाना !


किरण


मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कहो क्यों कर बैठे हो मान

माँ की रचनाओं में से आज मैंने एक बहुत पुरानी रचना चुनी है ! इसका सृजन काल भारत के स्वतंत्र होने से पूर्व का है ! उस समय एक आम भारतीय किस विवशता, व्याकुलता एवं पीड़ा के मानस को भोग रहा था यह कविता उस वेदना को बड़े ही सशक्त तरीके से अभिव्यंजित करती है ! आशा है इस कविता का रसास्वादन आप सभी इसके रचनाकाल को ध्यान में रख कर करेंगे और उस पीड़ा के सहभागी बनेंगे जिसे हर भारतीय ने तब झेला था !


कहो क्यों कर बैठे हो मान !
क्यों रूठे हो हाय बता दो हम तो हैं अनजान !
कहो क्यों कर बैठे हो मान !

पराधीनता में जकड़ी है यह भारत संतान ,
दाने-दाने को तरसे है खोकर सब अभिमान ,
नित्य सहते हैं हम अपमान !
कहो क्यों कर बैठे हो मान !

धन, वैभव, विद्या, बल, पौरुष पहुँचे इंग्लिस्तान ,
बुद्धि हुई है भ्रष्ट हमारी हृदय हुआ अज्ञान ,
बिसारा दया, धर्म अरु दान !
कहो क्यों कर बैठे हो मान !

मृतक समान पड़े हैं हम सब खोकर जन, धन, मान ,
बस केवल उन्नति की आशा बचा रही है प्राण ,
हाय कब आओगे भगवान !
कहो क्यों कर बैठे हो मान !

यदि अनजाने हुआ दयामय हमसे कुछ नुकसान ,
क्षमा करो अपराध कृपा कर विवश ना हो अवसान ,
कृपा कर दो स्वतन्त्रता दान !
कहो क्यों कर बैठे हो मान !


किरण