सोमवार, 3 सितंबर 2012

तेरी माया

 
 
 
 
रूप ने श्याम तेरे भरमाया ! 
फूल पत्र सुन्दर कलियाँ बन सबका ह्रदय चुराया ! 
रूप ने श्याम तेरे भरमाया ! 

किसीने पत्थर, फूल किसीने, किसीने क्षीर बताया 
वन उपवन में कहा किसीने किसीने नीर बताया ! 

कोई कहता वह मस्जिद में 'खुदा' बना है आया ,
कहा  किसीने 'गॉड' बना गिरिजा में मोहन आया ! 
 
कोई  कहता यमुना तट पर उसने रास रचाया ,
बन कर उसने ग्वाल बाल नवनीत चुरा कर खाया ! 

नंदग्राम में कहा किसीने नंद ने गोद खिलाया ,
राम रूप धर कर लंका में रावण वीर हराया ! 
 
कुरुक्षेत्र  रण भूमि में फिर वह पार्थ सखा बन आया ,
देकर गीता ज्ञान उसे फिर धर्म कर्म सिखलाया ! 

द्रुपद सुता ने की गुहार जब तत्क्षण चीर बढ़ाया ,
जल भीतर गज ग्राह लड़े तब आकर तुरंत छुड़ाया ! 

सुन-सुन करके ऐ मनमोहन तेरी अद्भुत माया ,
कोना-कोना ढूँढा जग का, पता न तेरा पाया ! 
 
निठुर तेरी निठुराई पर तब मन को रोना आया ,
आँखों से मेरी उमड़ आज जीवन में पावस छाया ! 


किरण







रविवार, 26 अगस्त 2012

अर्चना


आओ आओ बेग पधारो व्याकुल ह्रदय हमारा है ,
नाथ न क्यों सुनते अनुनय हो निठुर भाव क्यों धारा है !

दुखी दीन हैं, मन मलीन हैं तेरी गउएँ गोपाला,
आजा फिर दिखला दे मोहन मधुर दृश्य गोकुल वाला !

बृज की शोभा क्षीण हुई है ऐ बृजराज दुलारे आ ,
विरह व्यथा से व्याकुल गोपिन के जीवन उजियारे आ !

माँ जसुदा की सुघर गोद के प्यारे कुँवर कन्हैया आ ,
वंशीधारी, गिरिवरधारी, वन-वन वेणु बजैया आ !

किरण


बुधवार, 15 अगस्त 2012

पन्द्रह अगस्त














देहली  के कण-कण में जाने दबे पड़े कितने इतिहास ,
लाल किले की दीवारों ने देखे कितने हास विलास !

कभी पांडवों ने इसके स्वर्गांचल में मणिरत्न जड़े ,
कभी  स्वत्व पर बलि होने को इस पर ही चौहान लड़े !

देखा है इसकी मिट्टी ने मुगलों का उन्मत्त विलास ,
देखे हैं इसकी धरती ने जाने कितने मृदु मधुमास !

ये यमुना की लोल लहरियाँ देख चुकीं कितने उत्थान ,
और पतन के गहन गर्त में डूबे हुए गलित अभिमान !

इसके शांत अंक में सोये जाने कितने वीर प्रवण ,
कितनी  सतियों ने साजन संग किया मृत्यु का यहाँ वरण !

जब इस लाल किले के ऊपर फहराया परदेशी ध्वज ,
तब झाँसी में बिगुल बजा, चल पड़े वीर सब आलस तज !

हुआ शुरू जबसे स्वतन्त्रता देवी के मठ का निर्माण ,
खेल खेलने लगे मृत्यु का वीर दाँव पर रख कर प्राण !

पहले बनी नींव का पत्थर वह झाँसी की महारानी ,
जिसने राह दिखाई हमको आज़ादी की सुखसानी !

चले बाँध कर कफ़न शीष पर देशप्रेम के मतवाले ,
हँसते-हँसते झूल गये फाँसी पर कितने मतवाले !

आठ युगों की कठिन तपस्या नए देश में रंग लाई ,
'जय स्वदेश' 'जय हिंद' गा उठी मृदु स्वर भर जब शहनाई !

वह 'पन्द्रह अगस्त' सैंतालीस का पावन त्यौहार हुआ ,
जब अपने भारत की सत्ता पर हमको अधिकार हुआ !

बिखर गये सदियों के बंधन हुआ सफल वीरों का त्याग ,
हुआ देश आज़ाद, गुलामी चली गयी भारत से भाग !

इस गौरवमय पुण्य दिवस का क्यों न करें सम्मान सखे ,
आज  इसी 'पन्द्रह अगस्त' पर क्यों न करें अभिमान सखे !

बिछुड़ी हुई कीर्ति रानी का जब भारत से मिलन हुआ ,
आज वही 'पन्द्रह अगस्त' है जब संकट का शमन हुआ !

इस पावन अवसर पर साथी लिखा गया इतिहास नया ,
नव संवत्सर काल शिला पर चरण रेख शुभ डाल गया !

हुआ दीप्त अभिषेक तिलक से जब भारत का भाल प्रशस्त ,
'जय भारत' के साथ-साथ गूँजा 'जय जय पन्द्रह अगस्त' !


किरण









रविवार, 12 अगस्त 2012

श्याम हमारे आओ ...


मुरारी मुरली आज बजाओ ! 

भक्ति की गंगा जमुना में तुम भक्तों को नहलाओ ,
वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में आओ रास रचाओ ,
यमुना तट पर फिर मनमोहन मीठे राग सुनाओ ,
क्यों तुम रूठ गये हो कान्हा यह तो हमें बताओ ,
भारतवासी भक्त बनें फिर ऐसी राह दिखाओ ,
नैना प्यासे हैं दर्शन को अब न अधिक तरसाओ ,
क्षीर सिंधु का त्याग करो अब, श्याम हमारे आओ ! 


किरण


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

कन्हैया

 
 
गोकुल के रचैया अरु गोकुल के बसैया हरि ,
माखन के लुटैया पर माखन के रखैया तुम ! 
 
गोधन  के कन्हैया अरु गोवर्धन उठैया नाथ ,
बृज के बसैया श्याम बृज के बचैया तुम !

भारत रचैया अरु भारत बचैया कृष्ण ,
गीता के सुनैया अरु गीता के रचैया तुम ! 

बंसी के बजैया अरु चीर के चुरैया हरि  ,
नागन के ऊपर चढ़ि नृत्य के करैया तुम ! 
 
सारी  के चुरैया अरु सारी के बढ़ैया साथ ,
भरी  सभा द्रौपदी की लाज के रखैया तुम !

राधा के गहैया श्याम राधा के छुड़ैया योगी ,
गोपिन संग कुंजन में रास के रचैया तुम ! 

पापी अरु पापिन को स्वर्ग के दिलैया नाथ ,
शरण हूँ मैं लाज राखो कुँवर कन्हैया तुम ! 


किरण




 


मंगलवार, 31 जुलाई 2012

ये नयन बने कारे बादर


ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

करुणा कर दर्शन दें हमको ,
नहीं, अब न कहेंगी 'करुणाकर' !

क्यों प्रीति की बेल बढ़ाई तब ,
क्यों  विरह की आग लगाई अब , 
कहें कौन हुआ अपराध है कब , 
जब साथ रहीं हम उनके तब  ?
बेचैन करें मथुरा में जा ,
हमें गोकुल लगता दु:ख सागर ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

'अंतरयामी' वे क्यों हैं बने ,
जब उर अंतर को नहीं गुनें ,
ना ही दिलों का वे संताप हनें ,
कहे 'दु:खहारी' तब कौन उन्हें ? 
हमसे ही मिली हैं उपाधि सकल ,
क्या भूल गये वे नटनागर ? 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

यदि दीन न होते तो उनसे ,
सब 'दीनानाथ' नहीं कहते ,
जग  में न अनाथ अरे होते ,
तब 'नाथ' उन्हें हम क्यों कहते !
जब हम जैसों पर दया करें ,
कहालावें तभी वे 'दयासागर' ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

सब राग भोग हमने छोड़े ,
कुलकान त्याग बंधन तोड़े ,
जीवन के हैं अब क्षण थोड़े ,
कब तक यूँ रहेंगे मुँह मोड़े !
अब तो वर्षा ऋतु रहती नित ,
ये नयन बने कारे बादर ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 


किरण




रविवार, 22 जुलाई 2012

खेतों की महारानी





उमड़-घुमड़ कर आये बदरवा, रिमझिम बरसे पानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

रुन-झुन रुन-झुन बिछिया बाजे, झन-झन झाँझर बोले रे ,
कुहू-कुहू कोयलिया कुहुके, रनिया का मन डोले रे !

पँचरंग चूनर उड़े हवा में, लहँगे का रंग धानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

कारे धौरे बैल सुहाने, हल बक्खर की जोत रे ,
रजवा के संग जाये सजनिया ले अनाज की मोट रे !

वन में बोले मोर पपीहा, फुल बगिया हरषानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

हरी ओढ़नी धरती माँ की, लहर-लहर लहराये रे ,
चंदन बिरवा डाल हिंडोला बहू मल्हारें गाये रे!

उड़  कागा जो बीरन आवें, फले तुम्हारी बानी रे ,
घूँघट में खिल उठे सलोनी खेतों की महारानी रे !

हाथन मेंहदी, पैर महावर, माँग सिन्दूर सुहाये रे ,
तीखे नैना भरे लाज से, काजर को शरमाये रे !

छनक-छनक छन पहुँची बाजे, झाँझर झमक सुहानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

" गंगा मैया दीप सँजोऊँ, हार फूल ले आऊँ रे ,
खेतन  मेरे सोना बरसे  तो मैं तुम्हें नहाऊँ रे !"

बैठी शगुन मनावहिं गोरी, वर दे अवढर दानी रे ,
घूँघट  में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !



किरण