सोमवार, 29 मार्च 2010

मनोव्यथा

मन चलो एकांत में
सुख शान्ति से जीवन बिताने,
दु:ख कुछ जग का भुलाने,
आग कुछ उर की बुझाने !

हँस रहा जग देख तुझको
रुक न पल भर भी दिवाने,
बस चला चल राह अपनी
इक नयी दुनिया बसाने !

शून्य में चल गगन को
कुछ दु:खमयी ताने सुनाने,
व्यंग से कुचले ह्रदय के
भाव कुछ उसको दिखाने !

छोड़ दे ये मित्र सारे
हो चुके जो अब बेगाने,
शून्य से कर मित्रता
नैराश्य को आशा बनाने !

भार तू जग को अरे
अब रह न यों उसको दुखाने,
छोड़ मिथ्या मोह को रे
तोड़ दे बंधन पुराने !

क्षितिज के उस पार जा छिप
बैठ कर आँसू बहा ले,
निठुर जग की ज्वाल से रे
यह दुखी जीवन बचा ले !

किरण

शनिवार, 27 मार्च 2010

 
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मेरा परिचय

हँस कर पूछ रहे हो परिचय
कैसे दूँ निज परिचय आज !
जीवित ही शव हूँ मैं प्रियतम
हूँ अवसादों का प्रिय साज़ !

लहराता है प्रति पल-पल पर
पीड़ाओं का उदधि अपार !
असफलता की चट्टानों से
टकराता है पारावार !

सुख की रेखा कभी न जिसने
देखी हो वह क्या जाने
कैसा सुख है कैसा दुख है
भेदभाव कब पहचाने !

संसृति के विस्तृत प्रांगण में
लेकर अभिलाषा आई
निष्ठुर जग पर अपने सब
अरमान लुटाने मैं आई !

आशाओं की सजा आरती
बढ़ी विश्व मंदिर की ओर
स्वार्थ अंध संसृति ने सब पर
मारा निर्दय वज्र कठोर !

टूट गयीं अभिलाषायें सब
बिखर गये सारे अरमान
फूट गए आशा के दीपक
हुआ निराशा तम घमसान !

उर में भीषण अग्नि दहकती
है आहों का भैरव राग
पिघल-पिघल प्रतिपल नयनों से
बह उठता कुचला अनुराग !

अभिशापों से उर प्रदेश में
हुआ वेदनाओं का राज
टूटे-फूटे राग निकलते
त्रस्त पड़ी वीणा से आज !

मत पूछो ऐ देव अरे
मेरे जीवन की करूण कथा
छेडो मत दुखते छालों को
बढ़ जाती है और व्यथा !


किरण

गुरुवार, 25 मार्च 2010

विरहिणी

प्राण न क्या तुम तक पहुँचेगी
व्याकुल उर की करूण पुकार,
और न क्या मैं फिर पाउंगी
अपना लुटा हुआ संसार ?

प्रात पवन ऊषा के आँचल से
आती कुछ ले संदेश ,
और कल्पना पगली चल पड़ती
अपने प्रियतम के देश !

किन्तु भटक कर स्वयम्
भावना में खो जाती है पगली ,
और ह्रदय में छा जाती है
घोर निराशा की बदली !

सांध्य सुन्दरी लाज भरी
कह जाती कानों में आकर ,
उठ तेरे वे प्रियतम आये
जिन्हें बुलाती गानों में !

चौंक देखती किन्तु न कोई
आता, यह था केवल भ्रम ,
कैसे आज लौट आयेंगे
मेरे परदेसी प्रियतम !

मै बन करके श्याम घटा
प्रिय चंद्र छिपा लूँ अपने में ,
भाग्य तारिका चमक पड़े
यदि दर्शन पाऊँ सपने में !

किन्तु असंभव है यह मुझको
स्वप्न स्वप्न बन जाएगा ,
मेरे रूठे जीवनधन को
कौन मना कर लायेगा !

मुझे दीखता पंथ एक ही
प्रियतम तुम्हें भुला दूँ मैं ,
तेरी स्मृति की वेदी पर
अपनी भेंट चढ़ा दूँ मैं !

जीवन की पगडंडी तेरी
कुसुमों से कोमलतर हो ,
बिछें राह में कंटक मेरे
पैर बढ़ाना दुस्तर हो !

दीपमालिका जगमग जगमग
तेरे प्रांगण में चमकें ,
पीड़ा की ज्वाला में मेरा
जला हुआ यह उर दमके !

लुटी भावना की बस्ती में
यह चिनगारी चमक पड़े ,
भस्मसात अरमानों पर
झर-झर कर आँसू बरस पड़े !


किरण

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

संकल्प

तुम चाहो तो जग में ज्वाला सुलगा दो,
मैं स्वप्नों का संसार न मिटने दूँगी !

तुम विप्लव का संगीत सुनाने आये,
तुम पत्थर पर निज प्रीति लुटाने आये,
तुमने मुकुलित सुमनों का यौवन देखा,
तुमने उजड़े पादप का वैभव देखा !
तुम चाहे उपवन का सौरभ बिखरा दो,
मैं कलियों का अभिसार न मिटने दूँगी !

तुमने चंदा को ज्वालामय बतलाया,
तुमने तारों को हिमकण कह दिखलाया,
तुमने हलचल मय अंतरिक्ष को पाया,
तुमको पृथ्वी का सूनापन मन भाया !
तुम दीप गगन के चाहे भू पर ला दो,
मैं संध्या का श्रंगार न लुटने दूँगी !

पावस, गर्मी, पतझड़ भू के गौरव हैं,
धरती का इनसे ही यौवन अभिनव है,
समरसरंगी पर कभी न गुंजन छाया,
मधु ऋतु का वैभव कभी न कम्पन लाया !
तुम चाहे नन्दन वन की सुषमा ला दो,
मैं मधु ऋतु का सत्कार न करने दूँगी !

हिमगिरी ने रो-रो कर अरुणा बिखराई,
उसके नयनों की निधि करुणा बन छाई,
अब क्यों सागर उस पर अधिकार जताता,
क्यों सिन्धु प्रिया कह उसको जगत बुलाता !
तुम सागर को ही खींच यहाँ ले आओ,
मैं सरिता की जलधार न बढ़ने दूँगी !

तुम रोज़ी रोटी को यूँ ही चिल्लाते,
तुम अंतरतम के घाव व्यर्थ दिखलाते,
क्या पूँजी का यह मणिधर तुम्हें सुनेगा ?
श्रम का सम्बल काँटों का पंथ मिलेगा ?
तुम पूँजीपतियों के वैभव को आँको,
मैं भूखों की मुस्कान न मिटने दूँगी !

किरण

गुरुवार, 18 मार्च 2010

परित्यक्ता

हँस रहा भगवान मुझ पर
भाग्य मेरा रो रहा है !

मानसर के विमल मुक्ता
लुट चुके हैं, शून्य सीपी,
और उर के मधुर कम्पन में
बसी है मूर्ति पी की !
पर जगत की निठुरता से
प्रेम सम्बल खो रहा है !
हँस रहा भगवान मुझ पर
भाग्य मेरा रो रहा है !

प्रिय बने मेरे, मुझे
अपनी बना कर के गये वे,
उछलते अरमान उर के
कुचल कर संग ले गये वे !
मैं तड़पती रह गयी
उर स्मृति को ढो रहा है !
हँस रहा भगवान मुझ पर
भाग्य मेरा रो रहा है !

आज इस सूने हृदय की
कल्पना भी मर चुकी है,
आज एकल मैं खड़ी हूँ
मेरी दुनिया जल चुकी है !
विश्व पथरीली धरा में
बीज सुख के बो रहा है !
हँस रहा भगवान मुझ पर
भाग्य मेरा रो रहा है !

वे रहें आबाद, सुख के
स्वप्न आयें जगमगायें
और उनके सुखद जीवन को
अधिक सुखमय बनायें !
बस कथामय ही अरे
यह शून्य जीवन हो रहा है !
हँस रहा भगवान मुझ पर
भाग्य मेरा रो रहा है !

किरण

बुधवार, 17 मार्च 2010

उलझा जीवन

मुझे छोड़ दो जीवन साथी
तुम अपने पथ पर बढ़ जाओ,
मेरी उर वीणा मत छेड़ो
गा सकते हो यदि तुम, गाओ !
हँस न सकूँगी मैं, पाली है
अंतर में पीड़ा क्षण-क्षण,
फूट उठेंगे दुखते छाले
छेड़ इन्हें मत और दुखाओ !
मेरी उर वीणा मत छेड़ो,
गा सकते हो यदि तुम, गाओ !

सखे कहाँ तक इस संसृति में
मैं पत्थर बन कर विचरूँगी,
आशा और निराशा की
कैसे कब तक मनुहार करूँगी !
मिटा चुकी सारे सुख सपने
अब न किसी का ध्यान भी आता !
मेरे इस पागलपन के संग
सखे न तुम पागल बन जाओ,
मेरी उर वीणा मत छेड़ो
गा सकते हो यदि तुम, गाओ !

मैं हूँ शून्य दीप वह जिसका
स्नेह जल चुका तिल-तिल करके,
मैं वह सुमन लुटा कर सौरभ
बिखर चुका जो कण-कण बन के
मैं वह पात्र बिखर कर जिसका
जीवन शून्य बना जाता है,
मेरे इस उलझे जीवन की
लड़ियाँ साथी मत सुलझाओ !
मेरी उर वीणा मत छेड़ो
गा सकते हो यदि तुम, गाओ !

किरण