रविवार, 12 अगस्त 2012

श्याम हमारे आओ ...


मुरारी मुरली आज बजाओ ! 

भक्ति की गंगा जमुना में तुम भक्तों को नहलाओ ,
वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में आओ रास रचाओ ,
यमुना तट पर फिर मनमोहन मीठे राग सुनाओ ,
क्यों तुम रूठ गये हो कान्हा यह तो हमें बताओ ,
भारतवासी भक्त बनें फिर ऐसी राह दिखाओ ,
नैना प्यासे हैं दर्शन को अब न अधिक तरसाओ ,
क्षीर सिंधु का त्याग करो अब, श्याम हमारे आओ ! 


किरण


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

कन्हैया

 
 
गोकुल के रचैया अरु गोकुल के बसैया हरि ,
माखन के लुटैया पर माखन के रखैया तुम ! 
 
गोधन  के कन्हैया अरु गोवर्धन उठैया नाथ ,
बृज के बसैया श्याम बृज के बचैया तुम !

भारत रचैया अरु भारत बचैया कृष्ण ,
गीता के सुनैया अरु गीता के रचैया तुम ! 

बंसी के बजैया अरु चीर के चुरैया हरि  ,
नागन के ऊपर चढ़ि नृत्य के करैया तुम ! 
 
सारी  के चुरैया अरु सारी के बढ़ैया साथ ,
भरी  सभा द्रौपदी की लाज के रखैया तुम !

राधा के गहैया श्याम राधा के छुड़ैया योगी ,
गोपिन संग कुंजन में रास के रचैया तुम ! 

पापी अरु पापिन को स्वर्ग के दिलैया नाथ ,
शरण हूँ मैं लाज राखो कुँवर कन्हैया तुम ! 


किरण




 


मंगलवार, 31 जुलाई 2012

ये नयन बने कारे बादर


ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

करुणा कर दर्शन दें हमको ,
नहीं, अब न कहेंगी 'करुणाकर' !

क्यों प्रीति की बेल बढ़ाई तब ,
क्यों  विरह की आग लगाई अब , 
कहें कौन हुआ अपराध है कब , 
जब साथ रहीं हम उनके तब  ?
बेचैन करें मथुरा में जा ,
हमें गोकुल लगता दु:ख सागर ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

'अंतरयामी' वे क्यों हैं बने ,
जब उर अंतर को नहीं गुनें ,
ना ही दिलों का वे संताप हनें ,
कहे 'दु:खहारी' तब कौन उन्हें ? 
हमसे ही मिली हैं उपाधि सकल ,
क्या भूल गये वे नटनागर ? 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

यदि दीन न होते तो उनसे ,
सब 'दीनानाथ' नहीं कहते ,
जग  में न अनाथ अरे होते ,
तब 'नाथ' उन्हें हम क्यों कहते !
जब हम जैसों पर दया करें ,
कहालावें तभी वे 'दयासागर' ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 

सब राग भोग हमने छोड़े ,
कुलकान त्याग बंधन तोड़े ,
जीवन के हैं अब क्षण थोड़े ,
कब तक यूँ रहेंगे मुँह मोड़े !
अब तो वर्षा ऋतु रहती नित ,
ये नयन बने कारे बादर ! 

ऊधो उनसे कहना जाकर ! 


किरण




रविवार, 22 जुलाई 2012

खेतों की महारानी





उमड़-घुमड़ कर आये बदरवा, रिमझिम बरसे पानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

रुन-झुन रुन-झुन बिछिया बाजे, झन-झन झाँझर बोले रे ,
कुहू-कुहू कोयलिया कुहुके, रनिया का मन डोले रे !

पँचरंग चूनर उड़े हवा में, लहँगे का रंग धानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

कारे धौरे बैल सुहाने, हल बक्खर की जोत रे ,
रजवा के संग जाये सजनिया ले अनाज की मोट रे !

वन में बोले मोर पपीहा, फुल बगिया हरषानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

हरी ओढ़नी धरती माँ की, लहर-लहर लहराये रे ,
चंदन बिरवा डाल हिंडोला बहू मल्हारें गाये रे!

उड़  कागा जो बीरन आवें, फले तुम्हारी बानी रे ,
घूँघट में खिल उठे सलोनी खेतों की महारानी रे !

हाथन मेंहदी, पैर महावर, माँग सिन्दूर सुहाये रे ,
तीखे नैना भरे लाज से, काजर को शरमाये रे !

छनक-छनक छन पहुँची बाजे, झाँझर झमक सुहानी रे ,
घूँघट में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !

" गंगा मैया दीप सँजोऊँ, हार फूल ले आऊँ रे ,
खेतन  मेरे सोना बरसे  तो मैं तुम्हें नहाऊँ रे !"

बैठी शगुन मनावहिं गोरी, वर दे अवढर दानी रे ,
घूँघट  में खिल उठी सलोनी खेतों की महारानी रे !



किरण

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

पानी गिरा कर मेह के रूप में







 पानी गिरा कर मेह के रूप में
अन्न उगाते कभी अभिराम हैं !

शोभा दिखाते हमें अपनी जो ऐसी
फिर विद्युत रूप कभी वे ललाम हैं !









शब्द सुना कर घन गर्जन का
ध्वनि शंख की करते कभी बलभान हैं !

घनश्याम के रूप में आज सखी
इस हिंद में आये वही घन श्याम हैं !








किरण

सोमवार, 28 मई 2012

अश्रुमाल















नाथ तुम्हारी क्षुद्र सेविका लाई यह रत्नों का हार ,
तुम पर वही चढ़ाती हूँ मैं करना मेरे प्रिय स्वीकार !

मेरा मुझ पर नाथ रहा क्या जो कुछ है वह तेरा है ,
मुझे निराशा अरु आशा की लहरों ने प्रभु घेरा है !

तुम लक्ष्मी माँ के प्रिय पति हो रत्न भेंट हों कैसे नाथ ,
रत्नों की जब खान स्वयं माँ होवें प्रियतम तेरे साथ !

बस हैं यह आँसू ही भगवन्  जिनका है यह हार सजा ,
करती  भेंट करो स्वीकृत प्रभु यद्यपि तुम्हें यह रहा लजा !

किरण

शुक्रवार, 11 मई 2012

माँ की याद


आज आपको अपनी माँ की एक दुर्लभ रचना पढ़वाने जा रही हूँ जिसका रचना काल सन् १९५५-५६ का रहा होगा ! उन दिनों मातृ दिवस मनाने का चलन नहीं था ! माँ को किसी दिवस विशेष पर याद किया जाना चाहिये ऐसी प्रथा भी भारतीय समाज में तब प्रचलित नहीं थी ! लेकिन माँ के प्रति बेटी के प्रेम और श्रद्धा की यह शाश्वत धारा अनादि काल से प्रवाहित हो रही है और शायद जब तक सृष्टि का क्रम चलेगा यह प्रवाहित होती रहेगी ! लीजिए आज प्रस्तुत है एक ऐसी रचना जिसमें मेरी माँ ने अपनी माँ को व्याकुल होकर याद किया है ! मेरी नानीजी का देहांत सन् १९५५ में हुआ था !

माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं ! 
जन्मदायिनी जननी तूने उकता कर क्यों छोड़ी ममता ,
अरी कौन सी परवशता में पड़ यों जग से तोड़ी ममता ,
माँ बतला दे एक बार अब कैसे जीवन में विचरूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !
पल भर मेरी इन आँखों में आँसू तुझे न भाते थे माँ ,
उन आँखों में उमड़ सरोवर पल क्षण तुझे बुलाते हैं माँ ,
हृदय बना पाषाण छिपी जा कैसे तेरी खोज करूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !
हमें बिलखता छोड़ तुझे क्या अमरावति का सुख मन भाया ,
जो पीड़ा से अपने ही अंशों के अंतर को छलकाया ,
बिलख रहे ये प्राण इन्हें क्या कह समझा कर कष्ट हरूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !
भुला न पाती मैं तेरे अंतर का स्नेह सरोवर छल-छल ,
मिटा न पाती सौम्य मूर्ति अंतस से अपने हा क्षण पल ,
तेरे बिना दु:ख रजनी के , अन्धकार से क्यों न डरूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !
मिला तुझे क्या मेरा बचपन अपने हाथों मिटा गयी जो ,
बना सुरक्षित निज प्राणों को मेरी हस्ती मिटा गयी जो ,
माँ, ओ मेरी माँ , तेरी सुधि अंतर से कैसे बिसरूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !
देख उदासी हाय कौन दुखिया मन की मनुहार करेगा ,
पा आभास कष्ट का हा अब कौन धीर दे प्यार करेगा ,
माँ को खोकर ओ निर्दय प्रभु नव अभिलाषा कौन करूँ मैं !
माँ कैसे अब धीर धरूँ मैं !

किरण