अश्रु मेरी अमर निधि हैं, तुम मधुर मुस्कान ले लो,
किन्तु प्रियतम तुम न मेरे भग्न उर के साथ खेलो !
है मुझे अभिशाप ही प्रिय आस क्यों वरदान की फिर,
क्या कभी सुखमय पलों की कल्पना रह सकी स्थिर !
अब न उतनी शक्ति मुझमें सह सकूँ अवहेलना प्रिय,
और साहस भी न इतना कह सकूँ जो वेदना प्रिय !
मैं न दीपक ही बनी जो ज्वाल प्राणों में सँजोती,
और पागल शलभ भी ना बन सकी जो प्राण खोती !
मैं कलंकी चन्द्र के संग क्षीण क्षण-क्षण हो रही हूँ,
सखे वारिद की कनी बन भार दुःख का ढो रही हूँ !
खिलें जग में फूल सुख के, चुन रही मैं शूल साथी,
व्यथित उर आँसू लुटाता, हँस रहा जग निठुर साथी !
पुष्प वे ही धन्य हैं प्रिय कंठ की जो माल होते,
स्वेद सौरभ से लिपट कर स्नेह सरि में दुःख डुबोते !
चाहती पर मैं न बनना पुष्प जो प्रिय उर लगायें,
धूलि कण ही बन सकूँ जो प्रिय चरण में लिपट जायें !
किरण
गुरुवार, 13 मई 2010
मंगलवार, 11 मई 2010
साँझ घिर आई प्रवासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
तुम न आये, छा गयी जग पर न जाने कब उदासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
ह्रदय में तूफ़ान मचले, नयन में वारिद घनेरे,
बढ़ गए पश्चिम दिशा में निविड़ तम के व्यस्त घेरे,
तरसती है सिंधु तट पर मीन भी व्याकुल पियासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
चंद्रिका की सेज के बिखरे गगन में पुष्प सारे,
निशा विरहाकुल बिलखती गगन गंगा के किनारे,
चन्द्र की आकृति जलाती लाल लोहे के तवा सी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
मनुज, पशु, पक्षी सभी अपने घरों में शांत सोते,
स्नेह सुख में लींन, निज श्रम बिंदु परिजन बीच खोते,
एक तुम ही भूल बैठे पंथ घर का दूर वासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
किरण
तुम न आये, छा गयी जग पर न जाने कब उदासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
ह्रदय में तूफ़ान मचले, नयन में वारिद घनेरे,
बढ़ गए पश्चिम दिशा में निविड़ तम के व्यस्त घेरे,
तरसती है सिंधु तट पर मीन भी व्याकुल पियासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
चंद्रिका की सेज के बिखरे गगन में पुष्प सारे,
निशा विरहाकुल बिलखती गगन गंगा के किनारे,
चन्द्र की आकृति जलाती लाल लोहे के तवा सी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
मनुज, पशु, पक्षी सभी अपने घरों में शांत सोते,
स्नेह सुख में लींन, निज श्रम बिंदु परिजन बीच खोते,
एक तुम ही भूल बैठे पंथ घर का दूर वासी !
साँझ घिर आई प्रवासी !
किरण
रविवार, 9 मई 2010
बासी फूल
मैं पतझड़ का बासी फूल !
चढ़ न सकूँगी देव मूर्ति पर, मिटना होगा बन कर धूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
प्रिय के युगल चरण साकार, सह न सकेंगे मेरा भार,
सौरभ हीन शून्य जीवन मम, इसे सजाना है बेकार,
कान्त कल्पना प्रिय चरणों पर चढ़ने की, थी मेरी भूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
शून्य सदा मेरा उर अंतर, शून्य मेघ, निर्मल है अम्बर,
गगन पंथ में चढ़ता ढलता शांत चन्द्र, उत्तप्त दिवाकर,
मेरी भाव लहरियों से टकराता उर सागर का कूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
विस्मृति मुझे जगा कर जाती, स्मृति मुझे रुला कर जाती,
सुप्त दशा में जागृति का सुख सदा ध्यान में प्रिय के पाती,
जब स्थिर नयनों के झूले में प्रिय आकर जाते झूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
किन्तु निराशा का आधार मेरे लिए सदा साकार,
आशा का छल मुझे दिखाता प्रियतम का मृगजल सा प्यार,
अपने को खोकर उनको ही पाना है, जीवन का मूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
किरण
चढ़ न सकूँगी देव मूर्ति पर, मिटना होगा बन कर धूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
प्रिय के युगल चरण साकार, सह न सकेंगे मेरा भार,
सौरभ हीन शून्य जीवन मम, इसे सजाना है बेकार,
कान्त कल्पना प्रिय चरणों पर चढ़ने की, थी मेरी भूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
शून्य सदा मेरा उर अंतर, शून्य मेघ, निर्मल है अम्बर,
गगन पंथ में चढ़ता ढलता शांत चन्द्र, उत्तप्त दिवाकर,
मेरी भाव लहरियों से टकराता उर सागर का कूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
विस्मृति मुझे जगा कर जाती, स्मृति मुझे रुला कर जाती,
सुप्त दशा में जागृति का सुख सदा ध्यान में प्रिय के पाती,
जब स्थिर नयनों के झूले में प्रिय आकर जाते झूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
किन्तु निराशा का आधार मेरे लिए सदा साकार,
आशा का छल मुझे दिखाता प्रियतम का मृगजल सा प्यार,
अपने को खोकर उनको ही पाना है, जीवन का मूल !
मैं पतझड़ का बासी फूल !
किरण
गुरुवार, 6 मई 2010
तुम न आये
आज भी प्रिय तुम न आये,
और मैं बैठी अकेली राह में पलकें बिछाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
सप्त ऋषियों ने गगन में आज वन्दनवार बाँधे,
सोहता मंगल कलश सा धवल चन्दा मौन साधे,
जोहती हूँ बाट प्रियतम नयन में आँसू छिपाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
खिल उठी है रातरानी गंध चरणों पर चढ़ाने,
बह उठा है पवन चंचल प्रिय परस पर वारि जाने,
गगन गंगा में किसी ने दीप तारों के बहाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
स्वाँस वीणा पर दुखों की रागिनी प्रिय नित बजाती,
विरहिणी प्रिय आगमन हित मौन भावांजलि चढ़ाती,
झिलमिलाते दीप की मैं आरती बैठी सजाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
किरण
और मैं बैठी अकेली राह में पलकें बिछाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
सप्त ऋषियों ने गगन में आज वन्दनवार बाँधे,
सोहता मंगल कलश सा धवल चन्दा मौन साधे,
जोहती हूँ बाट प्रियतम नयन में आँसू छिपाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
खिल उठी है रातरानी गंध चरणों पर चढ़ाने,
बह उठा है पवन चंचल प्रिय परस पर वारि जाने,
गगन गंगा में किसी ने दीप तारों के बहाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
स्वाँस वीणा पर दुखों की रागिनी प्रिय नित बजाती,
विरहिणी प्रिय आगमन हित मौन भावांजलि चढ़ाती,
झिलमिलाते दीप की मैं आरती बैठी सजाये !
आज भी प्रिय तुम न आये !
किरण
मंगलवार, 4 मई 2010
धूल का अधिकार
मुझको फूलों से बहुत प्यार है लेकिन
अधिकार धूल का ही मुझ पर भारी है !
माना फूलों में है सुगंध मतवाली,
सुरभित जिससे उपवन की डाली-डाली,
इन फूलों से फल, फल से जीवन मिलता,
इन फूलों से श्रृंगार प्रकृति का खिलता,
पर मेरी धरती तो अवढर दानी है ,
इसकी महिमा देवों ने भी मानी है !
क्षण भंगुर वैभव, उपवन का क्या होगा,
मुझको धरती की समरसता प्यारी है !
सुनते हैं ब्रह्मा ने यह सृष्टि बनाई,
विष्णू ने पालन करके दिया बढाई,
शिव ने अपना संहारी चरण उठाया,
पल में संसृति का सुन्दर रूप मिटाया,
हैं पुरुषोत्तम श्रीराम गुणों के सागर,
कान्हा ने धर्म बचाया भू पर आकर,
हैं देव सदा रक्षक जग ने जाना है,
सब सिद्धिदात्र गणपति को ही माना है !
पर किसने उनका रूप रंग देखा है,
हमको पाषाणी प्रतिमा ही प्यारी है !
पाई देवों में भी विरोध की झाँकी,
पढ़ ली है इनकी कीर्ति कथा भी बाँकी,
ईर्ष्या की ज्वाला जलती उनमें पाई,
भय शंका भी तो उनमें रही समाई,
देखी उनमें भी पक्षपात की छाया,
उनको भी तो है भेंट भोग मन भाया,
पर उनके सब अवगुण हैं गुण बन जाते,
तब गुणी मनुज क्यों नहीं देव बन जाते ?
क्या होना है ऐसा देवत्व मना कर,
हमको अपनी मानवता ही प्यारी है !
नीलांगन में झिलमिल दीपक से जलते,
तारे केवल रजनी का ही तम हरते,
ये चन्दा सूरज भी उग कर छिप जाते,
आवश्यकतावश हम उन्हें जला न पाते,
उन पर न पतंगों की टोली मंडराती ,
उनके छिप जाने पर अंधियारी छाती,
तब अपना दीपक हमें जलाना पडता,
जिसकी ज्योती से मुग्ध पतंगा लड़ता,
चन्दा सूरज से बड़ी हमें अपनी यह
मिट्टी के दीपक की लौ ही प्यारी है !
किरण
अधिकार धूल का ही मुझ पर भारी है !
माना फूलों में है सुगंध मतवाली,
सुरभित जिससे उपवन की डाली-डाली,
इन फूलों से फल, फल से जीवन मिलता,
इन फूलों से श्रृंगार प्रकृति का खिलता,
पर मेरी धरती तो अवढर दानी है ,
इसकी महिमा देवों ने भी मानी है !
क्षण भंगुर वैभव, उपवन का क्या होगा,
मुझको धरती की समरसता प्यारी है !
सुनते हैं ब्रह्मा ने यह सृष्टि बनाई,
विष्णू ने पालन करके दिया बढाई,
शिव ने अपना संहारी चरण उठाया,
पल में संसृति का सुन्दर रूप मिटाया,
हैं पुरुषोत्तम श्रीराम गुणों के सागर,
कान्हा ने धर्म बचाया भू पर आकर,
हैं देव सदा रक्षक जग ने जाना है,
सब सिद्धिदात्र गणपति को ही माना है !
पर किसने उनका रूप रंग देखा है,
हमको पाषाणी प्रतिमा ही प्यारी है !
पाई देवों में भी विरोध की झाँकी,
पढ़ ली है इनकी कीर्ति कथा भी बाँकी,
ईर्ष्या की ज्वाला जलती उनमें पाई,
भय शंका भी तो उनमें रही समाई,
देखी उनमें भी पक्षपात की छाया,
उनको भी तो है भेंट भोग मन भाया,
पर उनके सब अवगुण हैं गुण बन जाते,
तब गुणी मनुज क्यों नहीं देव बन जाते ?
क्या होना है ऐसा देवत्व मना कर,
हमको अपनी मानवता ही प्यारी है !
नीलांगन में झिलमिल दीपक से जलते,
तारे केवल रजनी का ही तम हरते,
ये चन्दा सूरज भी उग कर छिप जाते,
आवश्यकतावश हम उन्हें जला न पाते,
उन पर न पतंगों की टोली मंडराती ,
उनके छिप जाने पर अंधियारी छाती,
तब अपना दीपक हमें जलाना पडता,
जिसकी ज्योती से मुग्ध पतंगा लड़ता,
चन्दा सूरज से बड़ी हमें अपनी यह
मिट्टी के दीपक की लौ ही प्यारी है !
किरण
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
प्रणय के क्षण
दिये प्रणय के जो क्षण तुमने,
जीवन के आधार बन गए ,
घृणा, उपेक्षा, पीड़ा, दंशन
परित्यक्ता को प्यार बन गये !
सुख सज्जा के स्वप्न ह्रदय ने
मिलन रात्रि में खूब सँवारे ,
हुई विरह की भोर, नयन के
मोती ही गलहार बन गये !
कभी निशा की शीतलता का
मोल न कर पाया था जो मन ,
उसके लिये गगन के तारे
झुलसाते अंगार बन गये !
जिन सौरभयुत सुमनों को चुन
कभी सजाई सेज पिया की ,
दुर्दिन की छाया पड़ते ही
वे ही तीखे खार बन गये !
अरमानों के विहग लुटे से
त्याग रहे प्राणों की ममता ,
खुले द्वार थे जिस मंदिर के
वे अब कारागार बन गये !
कैसे वे दिन रातें भूलूँ ,
कैसे भूलूँ उनकी बातें ,
सुख सरिता के मंद झकोरे
अरे उफनते ज्वार बन गये !
किरण
जीवन के आधार बन गए ,
घृणा, उपेक्षा, पीड़ा, दंशन
परित्यक्ता को प्यार बन गये !
सुख सज्जा के स्वप्न ह्रदय ने
मिलन रात्रि में खूब सँवारे ,
हुई विरह की भोर, नयन के
मोती ही गलहार बन गये !
कभी निशा की शीतलता का
मोल न कर पाया था जो मन ,
उसके लिये गगन के तारे
झुलसाते अंगार बन गये !
जिन सौरभयुत सुमनों को चुन
कभी सजाई सेज पिया की ,
दुर्दिन की छाया पड़ते ही
वे ही तीखे खार बन गये !
अरमानों के विहग लुटे से
त्याग रहे प्राणों की ममता ,
खुले द्वार थे जिस मंदिर के
वे अब कारागार बन गये !
कैसे वे दिन रातें भूलूँ ,
कैसे भूलूँ उनकी बातें ,
सुख सरिता के मंद झकोरे
अरे उफनते ज्वार बन गये !
किरण
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
मुझे मिले वे चरण
प्राण तरसते रहे निरंतर, मिला किसी का प्यार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
मंजिल दूर, डगर अनजानी, जीवन पथिक थका हारा,
एकाकी सर्वस्व लुटा कर फिरता है मारा-मारा,
निज अभीष्ट मंदिर का जिसने पाया अब तक द्वार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
अनदेखे सपनों में खोई आशा की दुलहिन भोली,
अनब्याही ही रही, उठी है कब उसके घर से डोली,
छल-छल छलके नयन, मिला पीड़ा को कुछ आधार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
विश्वासों के दीपक कब तक बिना स्नेह जलते जाएँ,
बेड़ी पड़ी पगों में कैसे फिर बंदी चलते जाएँ,
अगम सिंधु, पंकिल तट, टूटी नौका है, पतवार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
निठुर देवता छल कर मेरा जीवन क्या तुमने पाया,
मेरा निश्च्छल ह्रदय सुमन क्यों निष्ठुर बन कर ठुकराया,
बाल विहग भावों के निर्बल कर सकते प्रतिकार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
किरण
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
मंजिल दूर, डगर अनजानी, जीवन पथिक थका हारा,
एकाकी सर्वस्व लुटा कर फिरता है मारा-मारा,
निज अभीष्ट मंदिर का जिसने पाया अब तक द्वार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
अनदेखे सपनों में खोई आशा की दुलहिन भोली,
अनब्याही ही रही, उठी है कब उसके घर से डोली,
छल-छल छलके नयन, मिला पीड़ा को कुछ आधार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
विश्वासों के दीपक कब तक बिना स्नेह जलते जाएँ,
बेड़ी पड़ी पगों में कैसे फिर बंदी चलते जाएँ,
अगम सिंधु, पंकिल तट, टूटी नौका है, पतवार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
निठुर देवता छल कर मेरा जीवन क्या तुमने पाया,
मेरा निश्च्छल ह्रदय सुमन क्यों निष्ठुर बन कर ठुकराया,
बाल विहग भावों के निर्बल कर सकते प्रतिकार नहीं,
मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं !
किरण
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