सोच रहा मेरा पागल मन !
कौन शक्ति दुनिया में
जिससे है इतना भारी अपनापन !
सोच रहा मेरा पागल मन !
है सुख क्या दुःख कौन वस्तु है,
है अथवा यह सब केवल भ्रम,
क्या इस जीवन में सुख दुःख का
चलता ही रहता है यह क्रम,
क्यों नैराश्य है दुःख का सूचक,
क्यों है आशा ही में जीवन !
सोच रहा मेरा पागल मन !
अपने ही जीवन पर अपना
क्यों रहता अधिपत्य नहीं है,
मृत्यु बता जाती जो आकर
कुछ तेरा अस्तित्व नहीं है
है जीवन का सार अरे क्या
बस केवल चिंता औ चिंतन !
सोच रहा मेरा पागल मन !
पीड़ाओं का सागर है या
है अवसादों का साम्राज्य,
है क्या यह संसार चक्र जो
नहीं समझ में आता आज,
मृगतृष्णा सी इस माया में
फँस कर भटक रहा चंचल मन !
सोच रहा मेरा पागल मन !
किरण
रविवार, 25 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
प्यार की प्रतिमा
याद के मोती समेटे उर पटल में
स्वप्न की डोली उठाने जा रही हूँ ,
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
मैं सुहागन हूँ मगर वह जो सदा से
देवता द्वारा उपेक्षित ही रही है,
भावना की साधना में निरत शाश्वत
छलकती सी नयन निर्झरिणी बही है !
बेबसी ने होंठ मेरे सी दिये हैं,
सिसकते अरमाँ लुटाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
नित प्रतीक्षा में दिये जिसकी जला कर
जागती है आश की दुल्हन दीवानी,
आग आँचल में समेटे वेदना की
बन रही है बेखुदी की जो कहानी !
जो न आएगा कभी उसकी डगर पर
प्रीत की कलियाँ बिछाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
तड़पते अभिशप्त उर की दास्तानें
रात की वीरानियाँ कहने लगी हैं,
चाँदनी में डूबते अभिलाष के क्षण
वेदना की रात कुछ रहने लगी है !
रविकिरण की ज्योति से जो हैं प्रकाशित
मैं उन्हें दीपक दिखाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
किरण
स्वप्न की डोली उठाने जा रही हूँ ,
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
मैं सुहागन हूँ मगर वह जो सदा से
देवता द्वारा उपेक्षित ही रही है,
भावना की साधना में निरत शाश्वत
छलकती सी नयन निर्झरिणी बही है !
बेबसी ने होंठ मेरे सी दिये हैं,
सिसकते अरमाँ लुटाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
नित प्रतीक्षा में दिये जिसकी जला कर
जागती है आश की दुल्हन दीवानी,
आग आँचल में समेटे वेदना की
बन रही है बेखुदी की जो कहानी !
जो न आएगा कभी उसकी डगर पर
प्रीत की कलियाँ बिछाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
तड़पते अभिशप्त उर की दास्तानें
रात की वीरानियाँ कहने लगी हैं,
चाँदनी में डूबते अभिलाष के क्षण
वेदना की रात कुछ रहने लगी है !
रविकिरण की ज्योति से जो हैं प्रकाशित
मैं उन्हें दीपक दिखाने जा रही हूँ !
चरण रज से माँग में सिन्दूर भर कर
प्यार की प्रतिमा सिराने जा रही हूँ !
किरण
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
मैं दिये बुझते जला दूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ !
चुक गया है तेल जीवन का
न जिनमें ज्योति कण भर,
जा रहे हैं रूठ कर जो
विवश बंधन में जकड कर,
जो तनिक तुम मान दे दो
मैं ह्रदय रूठे मना लूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ १
स्वप्न सूने जा रहे हैं
छा रहा नभ वेदना का,
भर रहा नैराश्य मन में
घुट रहा दम भावना का,
तुम मधुर मुस्कान दे दो
मैं कली सूखी खिला दूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ !
देख मानव की विवशता
मौन नगपति हो रहा यों,
पतित पावन जाह्नवी का
आज गौरव खो रहा क्यों ?
प्रेरणा तुम प्राण दे दो
मैं विजय के गान गा दूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ !
किरण
मैं दिये बुझते जला दूँ !
चुक गया है तेल जीवन का
न जिनमें ज्योति कण भर,
जा रहे हैं रूठ कर जो
विवश बंधन में जकड कर,
जो तनिक तुम मान दे दो
मैं ह्रदय रूठे मना लूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ १
स्वप्न सूने जा रहे हैं
छा रहा नभ वेदना का,
भर रहा नैराश्य मन में
घुट रहा दम भावना का,
तुम मधुर मुस्कान दे दो
मैं कली सूखी खिला दूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ !
देख मानव की विवशता
मौन नगपति हो रहा यों,
पतित पावन जाह्नवी का
आज गौरव खो रहा क्यों ?
प्रेरणा तुम प्राण दे दो
मैं विजय के गान गा दूँ !
स्नेह का तुम दान दे दो
मैं दिये बुझते जला दूँ !
किरण
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
नाविक से
ले चल मेरी नौका पार !
भव सागर में बही जा रही,
नहीं किनारा कोई पा रही,
सुख दुःख की झंझा में पड़ कर
डूब रही मंझधार !
ले चल मेरी नौका पार !
नाविक मुझे वही तट भाये,
रहें जहाँ जग से ठुकराये,
जहाँ बसा हो एक अनोखा
पीड़ा का संसार !
ले चल मेरी नौका पार !
मैं भी उनमें घुलमिल जाऊँ,
उनके दुःख में दुःख बिसराऊँ,
सुखी जनों की कर अवहेला
करूँ दुखों को प्यार !
ले चल मेरी नौका पार !
अब नौका ले चलो वहाँ पर,
दुःख सागर तट मिलें जहाँ पर,
जिसके हर एक कण में गूँजे
करुणा की झंकार !
ले चल मेरी नौका पार !
आशा नागिन डस ना पाये,
निशा निराशा की हँस जाये,
अमा दिवा के शांत प्रहर में
जीवन का अभिसार !
ले चल मेरी नौका पार !
किरण
भव सागर में बही जा रही,
नहीं किनारा कोई पा रही,
सुख दुःख की झंझा में पड़ कर
डूब रही मंझधार !
ले चल मेरी नौका पार !
नाविक मुझे वही तट भाये,
रहें जहाँ जग से ठुकराये,
जहाँ बसा हो एक अनोखा
पीड़ा का संसार !
ले चल मेरी नौका पार !
मैं भी उनमें घुलमिल जाऊँ,
उनके दुःख में दुःख बिसराऊँ,
सुखी जनों की कर अवहेला
करूँ दुखों को प्यार !
ले चल मेरी नौका पार !
अब नौका ले चलो वहाँ पर,
दुःख सागर तट मिलें जहाँ पर,
जिसके हर एक कण में गूँजे
करुणा की झंकार !
ले चल मेरी नौका पार !
आशा नागिन डस ना पाये,
निशा निराशा की हँस जाये,
अमा दिवा के शांत प्रहर में
जीवन का अभिसार !
ले चल मेरी नौका पार !
किरण
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
आज वारिद रो रहे हैं
आज वारिद रो रहे हैं !
कुटिल जग की कालिमा निज अश्रुजल से धो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
देख कर संतप्त भू को पाप ज्वाला में सुलगते,
ह्रदय की सद्भावनाएँ वासनाओं में बदलते,
विकल होकर आज अपने धैर्य से च्युत हो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
ध्वंस लीला नीतियों की बढ़ रही जो आज भू पर,
देख ताण्डव नृत्य अत्याचार का सब लोक ऊपर,
स्वयं होकर दुखित अपना आज आपा खो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
बिलखते सुकुमार बालक कर रहे उनको विकल अति,
पीड़ितों की अश्रुधारा रुद्ध करती प्राण की गति,
सांत्वना के हेतु करूणा जल निरंतर ढो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
किरण
कुटिल जग की कालिमा निज अश्रुजल से धो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
देख कर संतप्त भू को पाप ज्वाला में सुलगते,
ह्रदय की सद्भावनाएँ वासनाओं में बदलते,
विकल होकर आज अपने धैर्य से च्युत हो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
ध्वंस लीला नीतियों की बढ़ रही जो आज भू पर,
देख ताण्डव नृत्य अत्याचार का सब लोक ऊपर,
स्वयं होकर दुखित अपना आज आपा खो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
बिलखते सुकुमार बालक कर रहे उनको विकल अति,
पीड़ितों की अश्रुधारा रुद्ध करती प्राण की गति,
सांत्वना के हेतु करूणा जल निरंतर ढो रहे हैं !
आज वारिद रो रहे हैं !
किरण
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
प्रणय का संभार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का सम्भार कैसा !
तुम लगा पाये न मेरे दु:ख का अनुमान साथी,
जान कर भी अब बने जो आज यों अनजान साथी,
है निराशा की धधकती आग एक महान साथी,
हो चुके हैं भस्म जिसमें छलकते अरमान साथी,
प्राण शीतल प्रेम में यह विरह का श्रृंगार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
जब खिला करते जगत में नित्य सुख के फूल साथी,
स्नेह सरि के जब मिले रहते सदा युग कूल साथी,
जब बढ़ी जाती प्रकृति भी निज नियम को भूल साथी,
तब मुझे क्यों स्नेह के साधन हुए दुःख मूल साथी,
है मुझे अभिशाप ही वरदान फिर अभिसार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो फिर प्रणय का संभार कैसा !
दूर है मेरा किनारा नाव बिन पतवार साथी,
क्या पता मैं डूब जाऊँ या कि पहुँचूँ पार साथी,
फूल सा जीवन मुझे तो अब बना है भार साथी,
आज मुझको भेंट देने पर तुला संसार साथी,
व्यर्थ है अनुनय विनय पाषाण में है प्यार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
आज विस्मृति सिंधु में स्मृति हुई म्रियम्राण साथी,
फिर किसी की याद में हैं भटकते से प्राण साथी,
क्या कभी होगा विनाशी विरह से भी त्राण साथी,
या सदा घायल ह्रदय में चुभेंगे ये बाण साथी,
हो निराशा रात्रि में यह आश का श्रृंगार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
किरण
तुम लगा पाये न मेरे दु:ख का अनुमान साथी,
जान कर भी अब बने जो आज यों अनजान साथी,
है निराशा की धधकती आग एक महान साथी,
हो चुके हैं भस्म जिसमें छलकते अरमान साथी,
प्राण शीतल प्रेम में यह विरह का श्रृंगार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
जब खिला करते जगत में नित्य सुख के फूल साथी,
स्नेह सरि के जब मिले रहते सदा युग कूल साथी,
जब बढ़ी जाती प्रकृति भी निज नियम को भूल साथी,
तब मुझे क्यों स्नेह के साधन हुए दुःख मूल साथी,
है मुझे अभिशाप ही वरदान फिर अभिसार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो फिर प्रणय का संभार कैसा !
दूर है मेरा किनारा नाव बिन पतवार साथी,
क्या पता मैं डूब जाऊँ या कि पहुँचूँ पार साथी,
फूल सा जीवन मुझे तो अब बना है भार साथी,
आज मुझको भेंट देने पर तुला संसार साथी,
व्यर्थ है अनुनय विनय पाषाण में है प्यार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
आज विस्मृति सिंधु में स्मृति हुई म्रियम्राण साथी,
फिर किसी की याद में हैं भटकते से प्राण साथी,
क्या कभी होगा विनाशी विरह से भी त्राण साथी,
या सदा घायल ह्रदय में चुभेंगे ये बाण साथी,
हो निराशा रात्रि में यह आश का श्रृंगार कैसा !
हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का संभार कैसा !
किरण
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
स्वप्न के ये खिलौने
मुझे दे दिये स्वप्न के ये खिलौने
कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ !
मुझे चाँदनी रात भाती नहीं है,
चमक तारकों की सुहाती नहीं है,
मुझे चाहिये स्नेह के दीप अनुपम
जिन्हें मैं जला कर जगत जगमगाऊँ !
यह बादल की रिमझिम मुझे छेड़ जाती,
यह बिजली दशा पर मेरी मुस्कुराती,
घटा मेरी आँखों में आकर छिपी है
जिसे चाहूँ जब मैं लुटाऊँ, बहाऊँ !
न आती मुझे प्रेम की लोरियाँ हैं,
न भाती प्रभाती मुझे त्याग की है,
मुझे चाहिये बेबसी के तराने
कि मैं ग़म के नग़मे बनाऊँ, सुनाऊँ !
वसंती पवन आज बौरा रहा है,
खिले फूल को चूम भौंरा रहा है,
जले दिल की दुनिया में उजड़ी बहारें
कहाँ पर बसाऊँ, कहाँ पर खिलाऊँ !
न मन्दिर, न मसजिद मुझे बरगलाये,
न मूरत किसी की मेरा मन लुभाये,
मुझे चाहिये एक तस्वीर ऐसी
कि जिस पर मिटूँ, ध्यान जिसका लगाऊँ !
नदी है या सागर न इसका पता है,
भँवर में पड़ी नाव तट लापता है,
मिले याद का एक सम्बल किसी का
कि जिसके सहारे उतर पार जाऊँ !
मुझे दे दिये स्वप्न के ये खिलौने
कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ !
किरण
कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ !
मुझे चाँदनी रात भाती नहीं है,
चमक तारकों की सुहाती नहीं है,
मुझे चाहिये स्नेह के दीप अनुपम
जिन्हें मैं जला कर जगत जगमगाऊँ !
यह बादल की रिमझिम मुझे छेड़ जाती,
यह बिजली दशा पर मेरी मुस्कुराती,
घटा मेरी आँखों में आकर छिपी है
जिसे चाहूँ जब मैं लुटाऊँ, बहाऊँ !
न आती मुझे प्रेम की लोरियाँ हैं,
न भाती प्रभाती मुझे त्याग की है,
मुझे चाहिये बेबसी के तराने
कि मैं ग़म के नग़मे बनाऊँ, सुनाऊँ !
वसंती पवन आज बौरा रहा है,
खिले फूल को चूम भौंरा रहा है,
जले दिल की दुनिया में उजड़ी बहारें
कहाँ पर बसाऊँ, कहाँ पर खिलाऊँ !
न मन्दिर, न मसजिद मुझे बरगलाये,
न मूरत किसी की मेरा मन लुभाये,
मुझे चाहिये एक तस्वीर ऐसी
कि जिस पर मिटूँ, ध्यान जिसका लगाऊँ !
नदी है या सागर न इसका पता है,
भँवर में पड़ी नाव तट लापता है,
मिले याद का एक सम्बल किसी का
कि जिसके सहारे उतर पार जाऊँ !
मुझे दे दिये स्वप्न के ये खिलौने
कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ !
किरण
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