मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
और जीने को न तुमसे स्नेह का आधार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
पंथ मेरा गगन के जल कण सजल करते रहेंगे,
चन्द्र की अवहेलना सह ज्योति कण झरते रहेंगे,
दीप भी बुझ जायें नभ के, है न इनकी चाह मुझको,
तम मुझे प्रिय, मैं न तुमसे दया का आधार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का आधिकार लूँगी !
जा बसूँगी मैं वहाँ मिट्टी जहाँ सूखी पड़ी हो,
झर गये हों पेड़ के पत्ते, न बेलें ही चढ़ी हों,
हो न कोकिल और बुलबुल, शून्य हो वन का कलेवर,
पर न मैं तुमसे सजलता, तृप्ति और बहार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
टूट जाये बीन चाहे, साज़ सब सूने पड़े हों,
कंठ स्वर हों भग्न, भावांकुर भले उजड़े पड़े हों,
क्षितिज तक भी स्वर न पहुँचें और प्रतिध्वनि डूब जाये,
पर न मैं स्वर, साधना या बीन की झंकार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
मैं अकेली ही भली, प्रियतम मुझे मत दो सहारा,
नियति का बन्धन सुदृढ़ मत खोलना फिर से दुबारा,
तुम न आओ, मत सृजन सुख का करो मेरे लिये कुछ,
याद अपनी फेर लो बस, मैं यही उपहार लूँगी !
मैं न तुमसे प्यार का अधिकार लूँगी !
किरण
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
जीत क्या है हार क्या है
जो किसी भी मूल्य पर
बीते दिवस लौटा सकी तो,
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
जीत क्या है हार क्या है !
था बड़ा जीवन सुनहरा,
मस्त, चिंता का न कुहरा ,
छू सका था जिसे केवल
खेलना, खिलना, मचलना !
जो यदि वह पा सकी तो
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
अश्रु का संसार क्या है !
एक था साथी ह्रदय का
मीत मेरे निज पलों का,
खो चुकी हूँ आज उसको
तुच्छ जिससे स्वर्ण भी था !
फिर उसे यदि खोज पाई
तो तुम्हें बतला सकूँगी
नयन का अभिसार क्या है !
वह मधुर मधुमास जिसमें
फूल, सौरभ, फाग जिसमें,
कोकिला के एक स्वर से
गूँज उठते राग जिसमें !
आ गया फिर भूल कर यदि
तो तुम्हीं कहने लगोगे
सृष्टि का श्रृंगार क्या है !
किरण
बीते दिवस लौटा सकी तो,
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
जीत क्या है हार क्या है !
था बड़ा जीवन सुनहरा,
मस्त, चिंता का न कुहरा ,
छू सका था जिसे केवल
खेलना, खिलना, मचलना !
जो यदि वह पा सकी तो
मैं तुम्हें बतला सकूँगी
अश्रु का संसार क्या है !
एक था साथी ह्रदय का
मीत मेरे निज पलों का,
खो चुकी हूँ आज उसको
तुच्छ जिससे स्वर्ण भी था !
फिर उसे यदि खोज पाई
तो तुम्हें बतला सकूँगी
नयन का अभिसार क्या है !
वह मधुर मधुमास जिसमें
फूल, सौरभ, फाग जिसमें,
कोकिला के एक स्वर से
गूँज उठते राग जिसमें !
आ गया फिर भूल कर यदि
तो तुम्हीं कहने लगोगे
सृष्टि का श्रृंगार क्या है !
किरण
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
खोया सा जीवन
यह मेरा खोया सा जीवन !
क्या फिर से पा जाऊँगी मैं
इस लुटी हुई दुनिया का धन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
मेरी सूनी-सूनी रातें,
प्रिय की मीठी-मीठी बातें,
फिर याद दिला जातीं आकर,
बीते सपने, बीते मृदु क्षण !
यह मेरा खोया सा जीवन !
स्मृति फिर-फिर कर आ जाती,
इस मन में आग लगा जाती,
इस जली चिता के अंगारे
बुझ गए, बचे केवल कुछ कण !
यह मेरा खोया सा जीवन !
श्मशान बनी दुनिया मेरी,
योगिनी भावना की फेरी,
कह जाती पल-पल आ करके,
बन परवाना जल जा ओ जन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
यह दीवानी क्यों दीवानी,
किसको भाती तेरी वाणी,
हो मौन होम कर दे पगली,
दुनिया की इच्छा पर तन मन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
नयनों की सरिता शुष्क रहे,
बादल से जल की धार बहे,
तू देख खड़ी तेरा जीवन,
यूँ बरस पड़ा बन कर सावन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
किरण
क्या फिर से पा जाऊँगी मैं
इस लुटी हुई दुनिया का धन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
मेरी सूनी-सूनी रातें,
प्रिय की मीठी-मीठी बातें,
फिर याद दिला जातीं आकर,
बीते सपने, बीते मृदु क्षण !
यह मेरा खोया सा जीवन !
स्मृति फिर-फिर कर आ जाती,
इस मन में आग लगा जाती,
इस जली चिता के अंगारे
बुझ गए, बचे केवल कुछ कण !
यह मेरा खोया सा जीवन !
श्मशान बनी दुनिया मेरी,
योगिनी भावना की फेरी,
कह जाती पल-पल आ करके,
बन परवाना जल जा ओ जन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
यह दीवानी क्यों दीवानी,
किसको भाती तेरी वाणी,
हो मौन होम कर दे पगली,
दुनिया की इच्छा पर तन मन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
नयनों की सरिता शुष्क रहे,
बादल से जल की धार बहे,
तू देख खड़ी तेरा जीवन,
यूँ बरस पड़ा बन कर सावन !
यह मेरा खोया सा जीवन !
किरण
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
चाँद और लहर
जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !
ऊब कर शून्यता से गगन की बहुत
एक दिन चाँदनी आ सरित से मिली ,
हर लहर में निरख ज्योति के पुंज को
एक प्रतिबिम्ब पाकर बहुत वह खिली !
वीचि के गान में भूल अपनत्व को
उन तरंगों में जा कर स्वयं खो गयी ,
ताल पर हर लहर की लगी नाचने
वह भँवर की सुशैया में जा सो गयी !
स्वप्न देखा अचानक उठी चौंक कर
चाँद तो रूठ कर के कहीं खो गया ,
किन्तु प्रतिबिम्ब लहरों में उसका निरख
क्या जाने अरे ज्योति को हो गया !
क्रोध से उर लगा काँपने उस घड़ी
श्याम मुख हो गया, द्वेष से भर गयी ,
चल पड़ी चंद्रिका लाल मुखड़ा किये
चक्षु से मोतियों की झड़ी लग गयी !
सत्य का अंश भी खोज पाई कहाँ
ईर्ष्या की निशा ने उसे घेर ली ,
जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !
किरण
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !
ऊब कर शून्यता से गगन की बहुत
एक दिन चाँदनी आ सरित से मिली ,
हर लहर में निरख ज्योति के पुंज को
एक प्रतिबिम्ब पाकर बहुत वह खिली !
वीचि के गान में भूल अपनत्व को
उन तरंगों में जा कर स्वयं खो गयी ,
ताल पर हर लहर की लगी नाचने
वह भँवर की सुशैया में जा सो गयी !
स्वप्न देखा अचानक उठी चौंक कर
चाँद तो रूठ कर के कहीं खो गया ,
किन्तु प्रतिबिम्ब लहरों में उसका निरख
क्या जाने अरे ज्योति को हो गया !
क्रोध से उर लगा काँपने उस घड़ी
श्याम मुख हो गया, द्वेष से भर गयी ,
चल पड़ी चंद्रिका लाल मुखड़ा किये
चक्षु से मोतियों की झड़ी लग गयी !
सत्य का अंश भी खोज पाई कहाँ
ईर्ष्या की निशा ने उसे घेर ली ,
जब लहर ने उठा शीश ऊपर लखा
चाँद ने मुस्कुरा कर निगाह फेर ली !
किरण
रविवार, 4 अप्रैल 2010
परदेशी निर्मोही !
वह पंथी तो परदेशी है ,
कर पल्लव हिला-हिला उसको
क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,
क्यों स्नेह जताते हो पादप !
क्या जाने उसका कौन नगर ,
क्या जाने उसकी कौन डगर ,
क्या जाने कहाँ लुटायेगा
वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !
निर्मम होते हैं परदेशी
जग तो यह ही कहता आया
क्यों इसे भूलते हो पादप ,
क्यों नेह लुटाते हो पादप !
तेरी छाया में आ क्षण भर
मेटा श्रम, उर भर तृप्ति अमर ,
वह आज न जाने कहाँ पहुँच
फिर अपना नया बनाये घर !
झिलमिल स्वप्नों की संसृति में
तुम याद न आओगे उसको ,
क्यों समय गँवाते हो पादप ,
क्यों प्यार लुटाते हो पादप !
रोते तो कितने ही आते ,
क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
जोड़ोगे कब तक किस-किस से
ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !
यह दुनिया है आनी जानी
रुक सका न कोई चिरजीवन
क्यों मोह बढ़ाते हो पादप ,
क्यों प्रीत लुटाते हो पादप !
किरण
कर पल्लव हिला-हिला उसको
क्यों व्यर्थ बुलाते हो पादप ,
क्यों स्नेह जताते हो पादप !
क्या जाने उसका कौन नगर ,
क्या जाने उसकी कौन डगर ,
क्या जाने कहाँ लुटायेगा
वह स्नेह सुधा प्याले भर-भर !
निर्मम होते हैं परदेशी
जग तो यह ही कहता आया
क्यों इसे भूलते हो पादप ,
क्यों नेह लुटाते हो पादप !
तेरी छाया में आ क्षण भर
मेटा श्रम, उर भर तृप्ति अमर ,
वह आज न जाने कहाँ पहुँच
फिर अपना नया बनाये घर !
झिलमिल स्वप्नों की संसृति में
तुम याद न आओगे उसको ,
क्यों समय गँवाते हो पादप ,
क्यों प्यार लुटाते हो पादप !
रोते तो कितने ही आते ,
क्षण भर रुक मौज मना जाते ,
जोड़ोगे कब तक किस-किस से
ऐसे रिश्ते ऐसे नाते !
यह दुनिया है आनी जानी
रुक सका न कोई चिरजीवन
क्यों मोह बढ़ाते हो पादप ,
क्यों प्रीत लुटाते हो पादप !
किरण
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
अरे कौन तुम !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
मैंने जीवन के प्रभात में विस्मृति की झाँकी देखी है ,
आश लता पर कान्त कल्पना की तितली बाँकी देखी है ,
मैंने देखा अरमानों को चहक-चहक मधुरिम स्वर करते ,
मैंने देखा अभिलाषा के सागर से तृष्णा घट भरते ,
किन्तु अरे तुम कौन राह में मेरी रोड़े अटकाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
तुम आये मेरे जीवन ने कसक वधू का कर पकड़ा है ,
तुम आये मेरे मानस को मोह व्याधि ने आ जकड़ा है ,
तुमने आ मेरे अंतर में विप्लव की ज्वाला सुलगा दी ,
शान्ति सुधा से भरे कटोरों में अशांति की सुरा मिला दी ,
सावन घन बन कर नयनों में कौन अरे तुम आ छाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
अब मैंने देखा रोटी के टुकड़ों पर लड़ने वालों को ,
क्षणभंगुर वैभव पर तिल-तिल प्राण भेंट करने वालों को ,
देखी है अतृप्ति की झंझा, देखा है आहों का नर्तन ,
देखा संसृति रंगमंच पर मृत्यु कामिनी का आवर्तन ,
सम्वेदन की मृदु वीणा पर कौन अरे तुम गा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
क्षण-क्षण बढ़ता इस विनाश पथ पर यह रथ निर्माणों का है ‘
हाट लग रही प्राणी मात्र की, मोल हो रहा प्राणों का है ,
जहाँ माँगती है दरिद्रता लक्ष्मी से स्वाँसों का लेखा ,
आज अचानक वहीं दीखती बदली सी नियति की रेखा ,
महा प्रलय के इस ताण्डव में क्यों तुम मुझको भा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
किरण
मैंने जीवन के प्रभात में विस्मृति की झाँकी देखी है ,
आश लता पर कान्त कल्पना की तितली बाँकी देखी है ,
मैंने देखा अरमानों को चहक-चहक मधुरिम स्वर करते ,
मैंने देखा अभिलाषा के सागर से तृष्णा घट भरते ,
किन्तु अरे तुम कौन राह में मेरी रोड़े अटकाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
तुम आये मेरे जीवन ने कसक वधू का कर पकड़ा है ,
तुम आये मेरे मानस को मोह व्याधि ने आ जकड़ा है ,
तुमने आ मेरे अंतर में विप्लव की ज्वाला सुलगा दी ,
शान्ति सुधा से भरे कटोरों में अशांति की सुरा मिला दी ,
सावन घन बन कर नयनों में कौन अरे तुम आ छाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
अब मैंने देखा रोटी के टुकड़ों पर लड़ने वालों को ,
क्षणभंगुर वैभव पर तिल-तिल प्राण भेंट करने वालों को ,
देखी है अतृप्ति की झंझा, देखा है आहों का नर्तन ,
देखा संसृति रंगमंच पर मृत्यु कामिनी का आवर्तन ,
सम्वेदन की मृदु वीणा पर कौन अरे तुम गा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
क्षण-क्षण बढ़ता इस विनाश पथ पर यह रथ निर्माणों का है ‘
हाट लग रही प्राणी मात्र की, मोल हो रहा प्राणों का है ,
जहाँ माँगती है दरिद्रता लक्ष्मी से स्वाँसों का लेखा ,
आज अचानक वहीं दीखती बदली सी नियति की रेखा ,
महा प्रलय के इस ताण्डव में क्यों तुम मुझको भा जाते हो !
अरे कौन तुम मेरे उर में पीड़ा बन कर मुस्काते हो !
किरण
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
मूक है वंशी तुम्हारी तो हुआ क्या ,
मैं उसीसे आज स्वर, लय, तान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
एक दिन जब प्यार सिर धुन रो रहा था,
स्वार्थ का साम्राज्य अविचल हो रहा था,
पापियों के भार से थी धरिणी कम्पित,
विकल कोलाहल जगत में हो रहा था,
अवनि को जो सुखद आश्वासन दिया था,
मैं उसी का आज तुमसे दान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
छोड़ कर बैकुंठ जब आये यहाँ थे,
स्वर्ग के सब श्रेष्ठ सुख लाये यहाँ थे,
नाच कर, गाकर, मधुर मुरली बजा कर,
प्रेम घन चहुँ ओर बरसाये यहाँ थे,
मैं उसी सुख वृष्टि की अभिनव झड़ी से,
आज नन्हीं बूँद एक महान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
एक दिन जब राधिका का प्रेम लेकर,
ओर उसको निज हृदय की भेंट देकर,
तुम चले अक्रूर संग तज विकल गोकुल,
लौट आने का सुखद वरदान देकर,
तब उन्हें जो स्नेह का सम्बल दिया था,
मैं तुम्हीं से आज वह वरदान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
राधिका का सरल मन बहला सके तुम,
पूज्य बनने विश्व में तब जा सके तुम,
किन्तु यह उस त्याग की ही है निशानी,
मान्यता जो आज इतनी पा सके तुम,
जो तुम्हें निज पाश में बाँधे हुए थे,
मैं तुम्हीं से आज वो अरमान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
आज कैसे मान लूँ बस मूर्ति हो तुम,
जो अधूरा है उसी की पूर्ति हो तुम,
अलस सोये तार वीणा के पड़े जो,
तुम उसी की तान हो, स्फूर्ति हो तुम,
स्नेह की भागीरथी फिर ला सकूँ जो,
मैं तुम्हीं से आज इसका ज्ञान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
देख लो यह अवनि फिर अकुला रही है,
आपदाओं की घटा फिर छा रही है,
बह उठी है आज करुणा की नदी वह,
जो न सागर का किनारा पा रही है,
अश्रुधारा से निमज्जित इन मुखों की,
मैं तुम्हीं से फिर मधुर मुस्कान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
किरण
मूक है वंशी तुम्हारी तो हुआ क्या ,
मैं उसीसे आज स्वर, लय, तान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
एक दिन जब प्यार सिर धुन रो रहा था,
स्वार्थ का साम्राज्य अविचल हो रहा था,
पापियों के भार से थी धरिणी कम्पित,
विकल कोलाहल जगत में हो रहा था,
अवनि को जो सुखद आश्वासन दिया था,
मैं उसी का आज तुमसे दान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
छोड़ कर बैकुंठ जब आये यहाँ थे,
स्वर्ग के सब श्रेष्ठ सुख लाये यहाँ थे,
नाच कर, गाकर, मधुर मुरली बजा कर,
प्रेम घन चहुँ ओर बरसाये यहाँ थे,
मैं उसी सुख वृष्टि की अभिनव झड़ी से,
आज नन्हीं बूँद एक महान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
एक दिन जब राधिका का प्रेम लेकर,
ओर उसको निज हृदय की भेंट देकर,
तुम चले अक्रूर संग तज विकल गोकुल,
लौट आने का सुखद वरदान देकर,
तब उन्हें जो स्नेह का सम्बल दिया था,
मैं तुम्हीं से आज वह वरदान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
राधिका का सरल मन बहला सके तुम,
पूज्य बनने विश्व में तब जा सके तुम,
किन्तु यह उस त्याग की ही है निशानी,
मान्यता जो आज इतनी पा सके तुम,
जो तुम्हें निज पाश में बाँधे हुए थे,
मैं तुम्हीं से आज वो अरमान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
आज कैसे मान लूँ बस मूर्ति हो तुम,
जो अधूरा है उसी की पूर्ति हो तुम,
अलस सोये तार वीणा के पड़े जो,
तुम उसी की तान हो, स्फूर्ति हो तुम,
स्नेह की भागीरथी फिर ला सकूँ जो,
मैं तुम्हीं से आज इसका ज्ञान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
देख लो यह अवनि फिर अकुला रही है,
आपदाओं की घटा फिर छा रही है,
बह उठी है आज करुणा की नदी वह,
जो न सागर का किनारा पा रही है,
अश्रुधारा से निमज्जित इन मुखों की,
मैं तुम्हीं से फिर मधुर मुस्कान लूँगी !
मैं तुम्हीं से आज अपने गान लूँगी !
किरण
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