सोमवार, 23 मई 2011

कैसा है संसार


अहो यह कैसा है संसार !

यहाँ पर मर मिटने का खेल ,
यहाँ है फूल शूल का मेल ,
कहीं वैभव छलकाते गान ,
कहीं पर सुख का है अवसान ,
कहीं यौवन का मेला है ,
कहीं बालकपन खेला है ,
वृद्ध कहते सिर पर कर मार ,
"हाय, दुखमय है यह संसार !"

कोई सुख में रहता है लीन ,
कोई रहता हरदम ग़मगीन ,
किसीको है जीवन की चाह ,
कोई मरता भर-भर कर आह ,
धर्म, धन, मान कोई पाता ,
कोई है भीख माँग खाता ,
सभी कह रहे पुकार-पुकार ,
"मोह माया मय है संसार !"

भानु का जब होता अवसान ,
चंद्र का होता है उत्थान ,
पुष्प ने पाया बालापन ,
निराला उसका आकर्षण ,
तुरत आया उसका यौवन ,
अंत बन बिखरा वह रज कण ,
शून्य हो कहते मेघ पुकार ,
"अरे, क्षणभंगुर है संसार !"

प्रथम बालापन है आया ,
युवावस्था ने भरमाया ,
देख कर धन, वैभव, माया ,
सभी कुछ पल में बिसराया ,
अनन्तर वृद्धापन आया ,
रोग ने आकर डरपाया ,
लिया तब औषधि का आधार ,
"प्रमादी है सारा संसार !"

हाय मन अटकाया धन में ,
पुत्र, पति, मात-पिता गण में ,
लिया नहीं राम नाम मन में ,
तेल जीवन घटता क्षण में ,
अंत में हुआ दीप निर्वाण ,
चिता का किया गया निर्माण ,
अग्नि कह रही पुकार-पुकार ,
"अरे अस्थिर है यह संसार !"


किरण

छत्र गूगल से साभार








14 टिप्‍पणियां:

  1. पुष्प ने पाया बालापन ,
    निराला उसका आकर्षण ,
    तुरत आया उसका यौवन ,
    अंत बन बिखरा वह रज कण ,
    शून्य हो कहते मेघ पुकार ,
    "अरे, क्षणभंगुर है संसार !"

    अद्भुत उदगार, कोई शब्द भी कम है उद्गारों के लिए, उत्क्रष्ठ साहित्य सेवा के लिए साधुवाद और बधाई

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  2. ...बहुत सशक्त एवं भावपूर्ण रचना |

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  3. हाय मन अटकाया धन में ,
    पुत्र, पति, मात-पिता गण में ,
    लिया नहीं राम नाम मन में ,
    तेल जीवन घटता क्षण में ,
    अंत में हुआ दीप निर्वाण ,
    चिता का किया गया निर्माण ,
    अग्नि कह रही पुकार-पुकार ,
    "अरे अस्थिर है यह संसार !"
    sunder panktiyan
    rachana

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  4. एक अच्छी रचना पढवाने के लिए आपका आभार !

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  5. कोई सुख में रहता है लीन ,
    कोई रहता हरदम ग़मगीन ,
    किसीको है जीवन की चाह ,
    कोई मरता भर-भर कर आह ,

    इस संसार का एकदम जीवंत चित्रण है, कविता में
    बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति

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  6. such me sab kuch samet diya apne apni rachna me shabdo dwara...

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  7. कोई सुख में रहता है लीन ,
    कोई रहता हरदम ग़मगीन ,
    किसीको है जीवन की चाह ,
    कोई मरता भर-भर कर आह ,

    बेहतरीन शब्‍द रचना ।

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  8. संसार का चित्र खींच दिया है ..सुन्दर और सशक्त रचना .

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  9. अहो यह कैसा है संसार !

    बहुत सुंदर रचना। ऐसी रचनाएं कभी कभी ही पढने को मिलती हैं।

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  10. तेल जीवन घटता क्षण में ,
    अंत में हुआ दीप निर्वाण ,
    चिता का किया गया निर्माण ,
    अग्नि कह रही पुकार-पुकार ,
    "अरे अस्थिर है यह संसार !"

    .... गहन चिंतन से परिपूर्ण एक सशक्त रचना..आभार

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  11. एक सशक्त रचना |बहुत भाव पूर्ण
    आशा

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